क्या पेड़ ध्यान लगाने में मदद कर सकते हैं?


सद्‌गुरुसद्‌गुरु बता रहे हैं कि कैसे पेड़ ऐसा वातावरण बनाने में मदद करते हैं जिसमें ध्यान आसानी से लगाया जा सकता है। वे बताते हैं कि हम और पर्यावरण दो अलग-अलग चीज़ें नहीं हैं, हम एक पूर्ण जीवन हैं।

बरगद का पेड़ ध्यान लगाने में मदद कर सकता है

सद्‌गुरु: पौधे आपकी भावनाओं और सोच के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं – ख़ास तौर पर कुछ पौधे। माना जाता है कि फिकस नस्ल के पौधे जैसे बरगद के पेड़ और उस परिवार के और दूसरे पेड़ बहुत संवेदनशील होते हैं। यही वजह है कि उन्हें भारत में ध्यान के लिए चुना जाता है क्योंकि अगर आप उस पेड़ के नीचे साधना करते हैं, तो यह एक माहौल तैयार कर देता है। यह अपने-आप में एक ध्यान कक्ष बन जाता है।
अगर आप जरुरी ऊर्जा पैदा करते हैं तो पौधे इसके प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। जब हम ध्यानलिंग तैयार कर रहे थे, तब मैंने पाया कि कुछ पौधे उस माहौल के लिए प्रतिक्रिया देते हुए अपना सहयोग दे रहे थे। यह वास्तव में अद्भुत था। अगर आपके पास बहुत सारे पेड़ हैं और वहाँ ध्यान होता है तो उस इलाके की ध्यानपरक खूबी को बनाए रखना आसान होगा। क्योंकि पेड़-पौधे उस खूबी को आसानी से संजोए रखते हैं। कुछ पेड़ ऐसे हैं जो आज भी इस लिहाज़ से बहुत ताकतवर माने जाते हैं।

                                       (संपांगी या मंगोलिया चंपाका )

इसके बारे में कई तरह के किस्से हैं। कहा जाता है कि जब गौतम बुद्ध चलते थे तो बहुत सारे पौधे बेमौसम ही खिल उठते थे। हो सकता है कि यह एक काव्यात्मक अभिव्यक्ति हो, पर यह सच भी हो सकता है क्योंकि ऐसा होना संभव है। दक्षिण भारत, कर्नाटक के बिलीगिरिरंगा पहाड़ियों में, डोडा संपिगे नामक पेड़ है। यह एक संपांगी पेड़ है जो कुछ हजार साल पुराना कहा जाता है। कहते हैं कि उसे अगस्त्य मुनि ने लगाया था और उसकी बहुत सारी कथाएँ हैं। अक्सर इसका जीवनकाल कुछ सदियों का होता है पर यह बहुत पुराना है। आपने ऐसा संपांगी पेड़ नहीं देखा होगा, यह अपने-आप में उलझ कर बहुत विशाल और विस्तृत हो गया है।

इस संस्कृति में, हजारों सालों से पेड़ों को बचाने और उन्हें जीवन और विवेक का रूप मानने की परंपरा रही है। इनमें से किसी भी पक्ष को आज सही तरह से बचाया नहीं जा सका है और उनमें से ज्यादातर खत्म हो चुके हैं। लेकिन पेड़ों को ऊंचा मानकर उनसे कुछ ज्ञान प्राप्त करने की परंपरा हमेशा रही है।

पेड़ हमारे फेफड़े हैं

एक बार मैं यूरोप में हो रहे एक इकोलॉजी समिट में मौजूद था। वहां एक जाने-माने प्रोफेसर ने पास आ कर मुझसे कहा, ‘ओह, तो आप वही हैं – पेड़ लगाने वाले अद्भुत इंसान?’
मैंने कहा, ‘नहीं, मैं कोई पेड़ लगाने वाला नहीं हूँ।’
‘पर आपने लाखों पेड़ लगाए हैं?’
‘फिर भी मैं पेड़ उगाने वाला नहीं हूँ।’
उसने हैरानी से पूछा, ‘तब आप क्या करते हैं?’
मैंने कहा, ‘मैं इंसानों को खिलाने का काम करता हूँ।’ अगर इंसान अपनी पूरी समझए जागरूकता के साथ खिलेगा और अपने आसपास के पर्यावरण से जुड़ेगा। तब हमें पता चलेगा कि हम और पर्यावरण दो अलग शब्द नहीं हैं। सादे शब्दों में कहें तो जब आप साँस छोड़ रहे हैं तो पौधे उसे ले रहे हैं। पौधे जो साँस छोड़ रहे हैं, उसे आप ले रहे हैं। केवल आधा श्वसन तंत्र ही आपकी छाती में है। बाकी आधा तो पेड़ पर लटक रहा है। अगर आपने उस आधे को नहीं संभाला तो बाकी आधे का वजूद भी खतरे में आ जाएगा।

                                            (आकाश माली या मिलिनटोनिया)

सभी जीवों के प्रति प्रेम रखना होगा

इस समय हम अपने इकोलॉजी से जुड़े मुद्दे को एक अहसान की तरह लेते हैं। जबकि यह केवल एक फर्ज नहीं, हमारा जीवन है। कहीं न कहीं हमें लगता है कि हम ही जीवन हैं। बाकी सब जीवन नहीं है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि जीवन का सारा अनुभव जीवन की भौतिक संवेदना पर आ टिका है। लोग सोच रहे हैं कि उनका शरीर ही जीवन है, इसलिए उन्हें केवल अपने में ही जीवन दिखता है। अगर आप आध्यात्मिक तौर पर जगे हुए हैं, तो आपको पता होगा कि हर चीज़ में जीवन है। तब आपको कहना नहीं होगा कि आप पर्यावरण की रक्षा करें। लोग दूसरे जीवों के लिए प्रेम की वजह से पर्यावरण की बातें नहीं कर रहे, उन्हें एहसास होने लगा है, ‘मेरा जीवन खतरे में है। अगर ऐसा रहा तो मैं और मेरे बच्चे जीवित नहीं रहेंगे। हमें इसके लिए कुछ न कुछ करना होगा।’ किसी ने आपको याद दिला दिया है कि आपका जीवन संकट में है। अपने आसपास के जीवन की परवाह करने के लिए यह तरीका बदकिस्मत माना जा सकता है।

हमारा जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं, आपस में जुड़ा है। आज कीड़े जितने स्वस्थ होंगे, आने वाले कल में हम उतने ही स्वस्थ होंगे। आध्यात्मिकता का मूल अर्थ है, सभी को साथ लेकर चलने का अनुभव। जब ऐसा अनुभव आपके पास होता है तो आप अपने आसपास की हर चीज़ की चिंता और परवाह करते हैं। क्योंकि जो भी अपनी ओर देखता है, अपने भीतर देखता है, उसे कुदरतन एहसास होता है कि वह और बाहरी अस्तित्व अलग नहीं हैं।

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