5 खतरे जो नाश कर सकते हैं धरती का

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आइये पढ़ते हैं सद्‌गुरु के विचार हमारी पृथ्वी की दशा पर, और जानते हैं 5 गंभीर खतरे जो पृथ्वी और पर्यावरण के नाश का कारण बन सकते हैं…

सद्‌गुरु : धरती माता एक विशाल जीवित प्राणी की तरह है, जो बहुत से ऐसे घटकों से मिलकर बनी है जो आपस में जुड़े हुए हैं। ये घटक लगातार एक-दूसरे से संपर्क में रहते हुए जीवन को संभालने के लिए जरूरी परिस्थितियां पैदा करते हैं। जीवन को बनाए रखने के लिए सूक्ष्म जगत और इस विशाल ब्रह्मांड को एक साथ मिलकर काम करना पड़ता है। सूक्ष्म बैक्टीरिया से लेकर जंगलों तक, हर घटक की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

अगर आप डॉक्टर होते और पृथ्वी को एक जीवित प्राणी के रूप में देखते, तो आप देख पाते कि उसकी जिन्दगी खतरे में है। मनुष्य के क्रियाकलाप जीवन का संतुलन बिगाड़ रहे हैं। अगर हम अपनी हरकतें नहीं सुधारेंगे तो जिन्दगी को बनाए रखने की पर्यावरण की क्षमता खत्म हो जाएग़ी।

जीवन को बनाए रखने की पृथ्वी की जो क्षमता है उसे मुख्य 5 चीजों से खतरा है –

 1. जैवविविधता की हानि

 अधिक जैवविविधता वाले पर्यावरण तंत्र अधिक स्थायी और लचीले होते हैं। हर प्रजाति पर्यावरण तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो अपने काम में दक्ष है और पूरे पर्यावरण में योगदान देता है। लेकिन हमारी पृथ्वी फिलहाल एक भयानक बदलाव से गुजर रही है। विशेषज्ञों का अंदाजा है कि प्रजातियों के प्राकृतिक रूप से लुप्त होने की दर के मुकाबले वर्तमान में उनके लुप्त होने की दर 1000 से 10000 गुना अधिक है।

2. असंतुलित खेती

हमारी अधिकांश खेती असंतुलित है जो पृथ्वी के लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर बहुत दबाव डालती है। आजकल आम तौर पर एक ही फसल की खेती की जाती है, जो अस्थिर पर्यावरण तंत्र को बढ़ावा देती है। अगर कोई किसान सिर्फ मक्‍का उपजाता है, तो वहां विनाशकारी कीटों को खाने वाले परभक्षियों के लिए कोई स्थान नहीं होगा, जिसकी वजह से कृत्रिम कीटनाशकों की जरूरत होगी। मोनोकल्चर या एकधान्य कृषि में बड़ी जड़ों वाली कोई फसल नहीं होती जो मिट्टी को पकड़ कर रख सके। इसके कारण मिट्टी का कटाव होता है। साथ ही, पोषक तत्वों को बहाल करने और मिट्टी में नाइट्रोजन की समस्या को हल करने वाली कोई फसल नहीं होती, जिस कारण रासायनिक उवर्रकों की जरूरत पड़ती है। दुनिया भर में कृषि भूमि बेकार हो रही है और हमारे सामने यह महत्वपूर्ण और अप्रिय सवाल उठ रहा है कि हमारी भावी पीढ़ियां अपना पेट कैसे भरेंगी।

3. जनसंख्या वृद्धि

पिछले 100 सालों में, जनसंख्या 2 अरब से बढ़कर 7 अरब से भी अधिक हो गई है। जनसंख्या के बढ़ने के साथ-साथ औद्योगिक क्रांति ने पृथ्वी के संसाधनों को खर्च करने में अधिक समर्थ बना दिया है। विकासशील देशों में अब भी जनसंख्या का आकार तेजी से बढ़ते रहने के कारण संसाधनों की मांग और भी बढ़ रही है। यह विकास धरती माता के अंगों को खराब कर रहा है। उसका लिवर अब हमारे सभी विषैले कचरों को छानने में असमर्थ है, जो हमारे पेयजल को प्रदूषित कर रहा है। उसके फेफड़े अब शहरों के विषैले धुएं को नहीं संभाल सकते और इस वजह से वातावरण में गैसों का संतुलन बिगड़ रहा है। इस बात का ध्यान रखना हमारी जिम्मेदारी है कि उसकी मृत्यु न हो।

4. जंगलों का नष्ट होना

पिछली शताब्दी के दौरान, दुनिया के अधिकांश जंगल खत्म हो गए हैं। पेड़ हमें ऑक्सीजन देते हैं, जल को छानते और साफ करते हैं, हवा को शुद्ध करते हैं, खेतों में मिट्टी का कटाव रोकते हैं और हमें भोजन भी देते हैं। यह सब कुछ मुफ्त में! जंगलों का नाश पृथ्वी की क्षमता को गंभीर रूप से नष्ट कर रहा है।

 5. समाप्त होने वाली ऊर्जा का अधिक इस्तेमाल

 औद्योगिक क्रांति की शुरुआत से ही, खनिज ईंधनों का उपभोग तेजी से बढ़ता आ रहा है। दुखद बात यह है कि यह इस्तेमाल निकट भविष्य में कम होता नहीं दिखता। आर्थिक विकास ने भी खनिज ईंधन आधारित ऊर्जा की मांग बढ़ाई है। आप पूछ सकते हैं कि तो इसमें गलत क्या है? खनिज ईंधन के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड निकलता है जो न केवल हवा प्रदूषित होती है, बल्कि यह एक ग्रीनहाउस गैस है जिसके असर से पृथ्वी के वातावरण में गर्मी बढती जा रही है। इसकी वजह से दुनिया भर के मौसम में भारी बदलाव हो रहा है और हमारा तथा हमारे ग्रह का अस्तित्व खतरे में पड़ता जा रहा है।


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