क्यों हैं सूती और रेशमी कपड़े सिंथेटिक कपड़ों से बेहतर?

क्यों हैं सूती और रेशमी कपड़े सिंथेटिक कपड़ों से बेहतर?
क्यों हैं सूती और रेशमी कपड़े सिंथेटिक कपड़ों से बेहतर?

अपनी दिनचर्या में योगाभ्यास को अपनाते समय लोग अक्सर ये जानना चाहते हैं कि अभ्यास करते समय किस तरह के कपड़े पहनने चाहिएं। आइये देखते हैं कि क्यों सूती और रेशमी कपड़े न सिर्फ योग के लिए, बल्कि अपने आप में भी सिंथेटिक कपड़ों से बेहतर हैं

 

आजकल “जैविक खेती” यानी “ऑर्गेनिक फार्मिंग” की काफी चर्चा हो रही है। खाने में जैविक उत्पादों (ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स) के इस्तेमाल की बात तो की ही जा रही थी, अब पहनने के लिए भी जैविक कपड़ों की बात की जा रही है। जैविक कपड़ों से मतलब जैविक तरीके से तैयार की गई कपास या रेशम से बने कपड़े। वैसे, सच तो यह है कि इंसान हमेशा से यह करता रहा है। हर चीज ऑर्गेनिक ही थी। आज भी भारत जैसे देश में बड़े पैमाने पर ऐसा ही है। जैविक वस्त्र पहनना या ऑर्गेनिक खेती करना कोई खास या नया विचार नहीं है। हमेशा से ऐसा ही तो होता आया है। पिछले कुछ दशकों में हमने इन चीजों को छोड़ दिया, क्योंकि कुछ लोगों के व्यावसायिक हित सामने आ गए। मैं यह बताने की कोशिश नहीं कर रहा हूँ कि आपको क्या पहनना चाहिए। आपको अपने जीवन को एक खास तरह की आजादी के साथ और बिना किसी विवशता के देखना चाहिए और उसके बाद ही कोई फैसला लेना चाहिए।

आप जिस तरीके के कपड़े पहनते हैं, वे आपके शारीरिक और मानसिक सेहत पर असर डाल सकते हैं। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण है कि आज मौसम कैसा है और आपके सेहत के लिए किस तरह के कपड़े बेहतर होंगे।

ऐसा नहीं है कि अगर आप सिंथेटिक कपड़े पहनेंगे तो आप मर जाएंगे। अगर आप सिर से पांव तक केवल सिंथेटिक कपड़े ही पहने हों तब भी आप ऐसे ही इंसान रहेंगे। ऐसे कपड़े पहनकर आप ध्यान भी कर सकते हैं, लेकिन उसके लिए आपको खास संघर्ष और कोशिश करनी पड़ेगी।
लेकिन ज्यादातर लोग अपनी भलाई के बारे में नहीं सोच रहे हैं। उदाहरण के तौर पर अपने देश में ही आप ऐसे लोगों को देख सकते हैं, जो चालीस डिग्री की गर्मी में भी काले रंग के कपड़े पहने घूम रहे हैं। आप क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं और कैसे रहते हैं, इसी से आपका स्वास्थ्य तय होता है। यह दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादातर लोग कुछ भी पहन लेते हैं। वे इस बात की जरा भी परवाह नहीं करते कि उन्हें कैसे कपड़े पहनने चाहिए और क्यों।

जैविक कपड़ों के बारे में इतनी बातें क्यों हो रही है? इसकी वजह है- जैविक कपड़े पहनने पर हमारा शरीर अलग तरह से काम करता है और सिंथेटिक कपड़े पहनने पर अलग तरीके से। इन दोनों के बीच एक बड़ा अंतर है। दूसरे जो कह रहे हैं, आपको उस पर यकीन करने की जरूरत नहीं है। खुद आजमाकर देखें और फिर तय करें कि आपको कैसा महसूस होता है। एक सप्ताह तक कच्चा रेशम या सूती वस्त्र पहनें, यहां तक कि भीतरी वस्त्र भी ऐसे ही पहनें। इसके बाद देखें कि आपका शरीर कैसा महसूस करता है। इसके बाद कुछ दिनों के लिए चुस्त और सिंथेटिक कपड़े पहनें। शरीर के काम करने के तरीके और आराम के स्तर में आपको बड़ा अंतर नजर आएगा।

कपड़ों, जेवर और चश्मे का साधना पर प्रभाव

युवावस्था में जब मैंने हठ योग किया था, तब हमें केवल कमरबंद(धोती का टुकड़ा जिससे सिर्फ कमर का हिस्सा ढकता है) पहनने की इजाजत थी। इसके पीछे वजह यही थी कि साधना के दौरान कम से कम अवरोध हो। परंपरागत रूप से भारत में लोग सिले हुए कपड़े नहीं पहनते थे। पुरुषों की धोती और महिलाओं की साड़ी दोनों ही बिना सिले कपड़े हैं। जब कपड़ों को सिल दिया जाता है तो कहीं न कहीं उर्जा के प्रवाह में रुकावट आती है। साधना करते वक्त इस रुकावट को आप कम से कम करने की कोशिश करते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि पश्चिमी देशों में भी आपको कमरबंद पहनना शुरू कर देना चाहिए। लेकिन योग का अभ्यास करने वालों को एथलीटों जैसे सिंथेटिक कपड़े नहीं पहनने चाहिए। आपके पसीने का बढऩा या कम होना, कुछ खास पदार्थों से तय होता है। कच्चा रेशम और सूत आपके सिस्टम के लिए सबसे अच्छे हैं। चूंकि ऑर्गेनिक कच्चा रेशम काफी महंगा होता है और मिलना भी मुश्किल होता है इसलिए ऑर्गेनिक कॉटन सबसे अच्छा विकल्प है। ऊन भी ठीक है। ऐसा नहीं है कि अगर आप सिंथेटिक कपड़े पहनेंगे तो आप मर जाएंगे। अगर आप सिर से पांव तक केवल सिंथेटिक कपड़े ही पहने हों तब भी आप ऐसे ही इंसान रहेंगे। ऐसे कपड़े पहनकर आप ध्यान भी कर सकते हैं, लेकिन उसके लिए आपको खास संघर्ष और कोशिश करनी पड़ेगी।

साधना शुरू करने से पहले आपको अपने शरीर से सारी चीजों को हटा देना चाहिए, खासकर वे चीजें जो धातु की बनी हैं। अगर आप विद्युत-चुंबकीय तरंगों की तस्वीर को देखें तो आपको पता चलेगा कि एक छोटी सी चीज भी अपने इर्द-गिर्द एक खास किस्म का घेरा पैदा करती है। अगर आप अपने शरीर में कोई भी धातु की या वैसी ही चीज पहने हुए हैं तो यह ऊर्जा के प्रवाह में रुकावट पैदा कर सकती है। कुछ अंग जो सुषुप्त अवस्था में रहते हैं, उनमें पहने जाने वाले आभूषण अपवाद हैं। जैसे कि कानों की बाली। इसके अलावे नाक में पहनी जाने वाली कील समेत हर तरह की धातु को हटा देना चाहिए। केवल रुद्राक्ष और सर्प मुद्रिका पहने रह सकते हैं। रुद्राक्ष आपके लिए मददगार है। यह आपकी ऊर्जा को एक सहारा देता है, एक ऊर्जा-कोष बना देता है और आपको ईश्वरीय कृपा के ज्यादा नजदीक लाता है। जब आप कुछ खास किस्म की साधना करते हैं तो इस बात की संभावना होती है कि आप अपने शरीर को छोड़ दें, हालांकि यह बेहद क्षीण है, दस लाख में एक बार ही ऐसा होता है। सर्प मुद्रिका इस संभावना को भी खत्म करती है। प्लास्टिक के हुक वाली ब्रा अगर आप पहने हैं, तो ठीक है, लेकिन आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके मेरुदंड के संपर्क में कोई भी धातु की चीज न हो।

अभ्यास के दौरान आपको अपना चश्मा भी उतार देना चाहिए। योग का सही अभ्यास करके बहुत से लोग अपने चश्मे से भी निजात पा चुके हैं।अपनी नजर को खुद-ब-खुद ठीक करने के लिए कुछ समय के लिए आपको चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस के बगैर रहना चाहिए।

साधना शुरू करने से पहले आपको अपने शरीर से सारी चीजों को हटा देना चाहिए, खासकर वे चीजें जो धातु की बनी हैं। अगर आप विद्युत-चुंबकीय तरंगों की तस्वीर को देखें तो आपको पता चलेगा कि एक छोटी सी चीज भी अपने इर्द-गिर्द एक खास किस्म का घेरा पैदा करती है।
अगर आप चश्मे के बगैर रह सकते हैं तो ऐसा करने की कोशिश करें। अगर आपको सिरदर्द होता है तो कुछ समय के लिए आंखें बंद करके रखें। अगर आप कॉन्टैक्ट लेंसों का प्रयोग कर रहे हैं तो कम-से-कम अपनी सुबह की साधना तो उनके बगैर ही करें। इस तरह से कुछ समय के बाद नजर की छोटी-मोटी समस्या तो अपने आप ही दूर हो जाएगी।

ऑर्गेनिक कॉटन के फायदों को देखते हुए अपने कपड़ों की गुणवत्ता पर ध्यान देना आज बहुत सारे लोगों के लिए व्यावहारिक नहीं भी हो सकता है, क्योंकि उनके पास इतने कपड़े हैं कि कई जन्मों का काम चल जाएगा। जब आप दो सौ कपड़े चाहते हैं, तो आप यूं ही कुछ भी खरीदते हैं। लेकिन अगर आपको सिर्फ आठ जोड़ी कपड़ों में जीवन बिताना मंजूर हो, तो आप मात्रा की जगह पर गुणवत्ता को महत्व दे सकते हैं।

समय आ गया है, जब ज्यादातर लोगों को हर मामले में मात्रा के ऊपर गुणवत्ता को महत्व देना चाहिए। इसी तरह से हम इस धरती को बचा सकते हैं। समस्या यह है कि आजकल लोग ज्यादा से ज्यादा मात्रा के पीछे दौड़ रहे हैं और इस धरती पर चीजों की मात्रा भरपूर नहीं है। अगर आप मात्रा के बजाय गुणवत्ता को महत्व देंगे तो निर्मल होते जाएंगे और इस धरती पर हम सभी के लिए कुछ न कुछ होगा।

 


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