कावेरी नदी विवाद का स्थायी हल निकल सकता है

कावेरी नदी विवाद का स्थायी हल निकल सकता है

सद्‌गुरुतमिलनाडु और कर्नाटक कावेरी के जल बंटवारे को लेकर दशकों से लड़ते रहे हैं। सद्‌गुरु सुझा रहे हैं कि इस समस्या का स्थाई समाधान कैसे निकाला जा सकता है।

जल एक ऐसा संसाधन है, जिसे संभालना जरूरी है। पिछले कुछ दशकों में हमने वास्तव में इस पर ध्यान नहीं दिया है। जल संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए कई सब्सिडी हैं मगर हमने इस पर ध्यान नहीं दिया कि हम खेती का कौन सा तरीका अपनाएं जिससे पानी की बचत हो। जैसे तमिलनाडु में हम अब भी बड़े पैमाने पर बाढ़ सिंचाई का इस्तेमाल करते हैं, जो पानी के उपयोग का सबसे निर्मम तरीका है। यह न तो जमीन के लिए अच्छा है और न ही फसल के लिए। यह तरीका पहले अपनाया जाता था लेकिन अब खेती करने के ज्यादा असरदार तरीके हैं। अगर आप एक जगह पर अधिक पानी छोड़ देंगे तो वहां की मिट्टी से पोषक तत्व बह जाते हैं और मिट्टी में सारी जैव क्रिया धीमी हो जाएगी। फसल भले ही हरी दिखे लेकिन इससे उसे कई रूपों में नुकसान होता है।

बिना जंगलों के नदी नहीं बह सकती

अगर हम इसमें बदलाव ले आएं, तो तमिलनाडु पानी की अपनी जरूरत को खुद संभाल सकता है। इसके अलावा हमें कावेरी पर भी अधिक ध्यान देने की जरूरत है। मैंने भागमंडल से कृष्णराज सागर बांध और कर्नाटक में वृंदावन गार्डन तक कावेरी में राफ्टिंग की है। यह करीब 160 किलोमीटर की दूरी है।

कावेरी

मुझे ट्रक के चार ट्यूब और बारह बांसों पर रैफ्टिंग में लगभग तेरह दिन लगे थे। मैं इस इलाके को बहुत अच्छी तरह जानता हूं। एक चीज अलग से दिखाई देती है कि इस पूरे 160 किलोमीटर में सिर्फ पहले 30 से 35 किलोमीटर तक जंगल है।

अगर जंगल नहीं होंगे तो कुछ समय बाद कोई नदी नहीं बचेगी। हम उसी 35 किलोमीटर घाटी को जलग्रहण क्षेत्र मानते हैं। नहीं, जल ग्रहण क्षेत्र पूरी नदी के साथ होना चाहिए।
उसके बाद सिर्फ खेत दिखाई देते हैं। इस तरह कोई नदी कैसे बह सकती है? दक्षिणी भारत में बर्फ से पानी प्राप्त करने वाली नदियां नहीं हैं। यहां जंगल से पोषित नदियां हैं। अगर जंगल नहीं होंगे तो कुछ समय बाद कोई नदी नहीं बचेगी। हम उसी 35 किलोमीटर घाटी को जलग्रहण क्षेत्र मानते हैं। नहीं, जल ग्रहण क्षेत्र पूरी नदी के साथ होना चाहिए।

नदी की पूरी लम्बाई के साथ पेड़ लगाने होंगे 

लोगों को लगता है कि पानी के कारण पेड़ हैं। लेकिन नहीं, पेड़ों के कारण पानी है।

आज हमारी नदियां इस तरह से घट रही हैं कि अगले 20 सालों में वे मौसमी हो जाएंगे। अभी ही कावेरी साल में दो से तीन महीने समुद्र तक नहीं पहुंच पाती। यह इस देश में एक आपदा की शुरुआत है।
 नदी की पूरी लंबाई के साथ दोनों तटों पर कम से कम एक किलोमीटर तक, जहां भी सरकारी जमीन हो, हमें तत्काल वहां जंगल लगा देना चाहिए। जहां वह किसी स्थानीय किसान की जमीन हो, सरकार को उसे कृषि से बागवानी की ओर ले जाना चाहिए। अगर आप किसी किसान को खेती से बागवानी की तरफ ले जाना चाहते हैं, तो आपको उसे पहले पांच सालों के लिए सब्सिडी देनी होगी जब तक कि पेड़ फल न देने लगें। एक बार उपज आ जाने के बाद आपको निजी कंपनियों को वहां फलों से संबंधित उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि सैंकड़ों किलोमीटर में फैले बागवानी उत्पादों को खरीदा जा सके। अगर आप किसान को इसके आर्थिक फायदे बताएंगे, कि पेड़ और बागवानी की फसलें लगाने पर वह जमीन को जोतने से अधिक कमा सकता है, तो वह स्वाभाविक रूप से आपकी बात मानेगा। अगर आप नदी के दोनों ओर कम से कम एक किलोमीटर तक पेड़ लगा दें, अगर इससे ज्यादा हो तो बहुत बढ़िया होगा, तो पन्द्रह सालों में कावेरी में कम से कम दस से बीस फीसदी पानी बढ़ जाएगा। आज हमारी नदियां इस तरह से घट रही हैं कि अगले 20 सालों में वे मौसमी हो जाएंगे। अभी ही कावेरी साल में दो से तीन महीने समुद्र तक नहीं पहुंच पाती। यह इस देश में एक आपदा की शुरुआत है।

हम कुछ करें, या फिर प्रकृति कुछ करेगी

‘इंडिया’ शब्द ही ‘इंडस’ यानि सिंधु नदी से बना है। हम एक नदी सभ्यता हैं। हमारी सभ्यता नदियों के तट पर ही विकसित हुई है।

हमारे पास चुनाव यह है कि हम इसे अपनी तरफ से सुधार लें या प्रकृति को ऐसा करने दें। अगर प्रकृति ऐसा करती है, तो वह तरीका बहुत क्रूर होगा।
आज हमारी सारी नदियां खतरे में हैं। एक-दूसरे से लड़ने की बजाय हमें इन नदियों को पुनर्जीवित करने के तरीके खोजने होंगे। वरना कुछ सालों में हम बोतल के पानी को पिएंगे नहीं, बल्कि उसी से नहाएंगे। आधा देश पहले ही ऐसी स्थिति में पहुंच चुका है, जहां वे अपने दिन की शुरुआत नहाने से नहीं करते क्योंकि इसके लिए पानी ही नहीं होता। कुछ सालों में हम इस स्थिति में होंगे, जिसमें हम दस दिन में एक बार नहा पाएंगे। हम अपने बच्चों के लिए ऐसी विरासत छोड़कर जा रहे हैं, कि चाहे आपके पास जो कुछ भी हो आप खुशहाली में नहीं जी पाएंगे, जब तक कि प्रकृति कोई गंभीर सुधार नहीं करती। हमारे पास चुनाव यह है कि हम इसे अपनी तरफ से सुधार लें या प्रकृति को ऐसा करने दें। अगर प्रकृति ऐसा करती है, तो वह तरीका बहुत क्रूर होगा।

हजारों सालों से इन नदियों ने हमें गले लगाया है और हमारा पालन-पोषण किया है। अब समय है कि हम अपनी नदियों को गले लगाएं और उनका पोषण करें।

कावेरी नदी 12, विकिपीडिया

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