एक सूत्र में पिरोना होगा पूरे देश को

भारत

पिछले कुछ महिनों में भ्रष्टाचार के जाने कितने मामले सुर्खियों में छाए रहे हैं – 2जी, कोलगेट, आईपीएल, वगैरह-वगैरह। लगता है भ्रष्टाचार देश के हर क्षेत्र में फैल चुका है। भारत से भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए क्या किया जाना चाहिए इस पर सद्‌गुरु के विचार।

आज हमारे समाज में भ्रष्टाचार इस कदर फैल चुका है कि हम ये पूछने की बजाय कि “कौन भ्रष्ट है?” यह पूछने लगे हैं कि “कौन ईमानदार है?” ज़रूरी है कि हम इस बात को उसके सही अर्थों में समझें। ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुट्ठी-भर लोग ही भ्रष्ट हैं, भ्रष्टाचार तो पूरे देश को अपनी गिरफ्त में लिये हुए है। पुलिसवाला सामने न खड़ा हो तो भला कितने लोग लाल बत्ती पर अपनी गाड़ी रोकेंगे?  मुश्किल से दस फीसदी। बाकी तमाम लोग भ्रष्ट हैं। अगर आप उनको फयदा ऐंठने वाली जगह पर बिठायेंगे तो आप जानते ही हैं वे क्या करेंगे।

गरीबी की हालत में लोग किसी-न-किसी तरह एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। पर आर्थिक संपन्नता आने के बाद भारत को एक राष्ट्र के रूप में जोड़े रखना बहुत बड़ी चुनौती साबित होगा, क्योंकि हम अब तक पूरे देश को एक सूत्र में नहीं पिरो पाये हैं।

थोड़े दिन पहले मैं कुछ छात्रों से बात कर रहा था। एक चौदह साल के लड़के ने मुझसे कहा कि वह सरकार के सबसे भ्रष्ट विभाग में काम करना चाहता है ताकि वह खूब पैसा बना सके! उसको यह बिलकुल गलत नहीं लगता। वह सोचता है कि ज़िंदगी संवारने का यही तरीका है। यह वही देश है जहां 65 वर्ष पहले आज़ादी की लड़ाई में लोग सड़कों पर अपनी जान निछावर करने को तैयार थे। सिर्फ एक ही पीढ़ी के बाद हाई स्कूल में पढ़ने वाला छोटा-सा लड़का कह रहा है कि वह सरकार के सबसे भ्रष्ट विभाग में काम करना चाहता है। कितनी लज्जाजनक स्थिति है! सच्चाई और ईमानदारी के स्तर में कितनी जबरदस्त गिरावट आयी है! लोग सोचते हैं, “भला मैं इस पचड़े में क्यों पड़ूं? मैं बस अपना खयाल रखूं।” पर ज़िंदगी इस तरह नहीं चलती। हम व्यक्तिगत रूप से कितने भी काबिल क्यों न हों जब तक हमारा समाज और देश ठीक से नहीं चलेगा, हम ठीक से नहीं रह सकते।

आज इसलिए ऐसा हो रहा है क्योंकि हमने कुछ खास बातों पर ध्यान नहीं दिया। लोगों के दिल और दिमाग में ‘राष्ट्र’ की सोच अब तक गहराई तक नहीं उतर पाई है। हमने इस इरादे से कि यह सोच मजबूत हो, आज तक कोई भी कदम नहीं उठाया। राष्ट्र-निर्माण का अर्थ केवल इमारतों का निर्माण नहीं होता, इसका अर्थ होता है जन-निर्माण। आर्थिक संपन्नता आने के बाद भारत को एक राष्ट्र के रूप में जोड़े रखना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित होगा, क्योंकि हम अब तक पूरे देश को एक सूत्र में नहीं पिरो पाये हैं। गरीबी की हालत में लोग किसी-न-किसी तरह एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। अगर हम सांस्कृतिक मूल्यों के जरिए देश में अखंडता की भावना को विकसित नहीं कर पाए तो अमीरी आने पर बिखराव निश्चित समझिए।

भारत में हर सौ किलोमीटर की दूरी पर लोगों की भाषा-बोली, वेशभूषा, खान-पान सब-कुछ अलग होता है। तो फिर ऐसा क्या है जो हम सबको एक राष्ट्र के रूप में पिरोये हुए है? वास्तव में यह सांस्कृतिक आधार और आध्यात्मिक सोच ही है जो हम सबको एक साथ जोड़े हुए है। पिछले कुछ दशकों से यह सांस्कृतिक ताना-बाना बुरी तरह से उधड़ने लगा है। अगर हम एक राष्ट्र के रूप में आगे तरक्की करना चाहते हैं तो धर्म-मजहब, जात-पांत, भाषा-बोली अलग होने के बावजूद हम सबको एक सूत्र में पिरोने वाले सांस्कृतिक सूत को मजबूत करना ही होगा। 

 Ravages @flickr

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