बिजली की समस्या समाधान क्या है?

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इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया में ऊर्जा की जरूरत तेजी के साथ बढ़ रही है। कहीं न कहीं से आपको इसे पैदा तो करना ही होगा। अब सवाल यह है कि ऊर्जा की समस्या का हल क्या है?

प्रश्न: सद्‌गुरु, योगिक नजरिये से देखें तो वैकल्पिक ऊर्जा के तौर पर शांतिपूर्ण नाभिकीय ऊर्जा का इस्तेमाल करने के बारे में आपकी क्या राय है? जलवायु परिर्वतन की चुनौतियों से निबटने के लिए शून्य उत्सर्जन वाले ऊर्जा के इस स्रोत का कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है? करीब चार साल पहले कुछ जाने माने वैज्ञानिकों ने यह कहा था कि अगर हम नाभिकीय ऊर्जा की ओर नहीं मुड़ते हैं, तो इस धरती और ओजोन की परत को जो नुकसान हुआ है, उसमें कोई सुधार नहीं होगा। अगर नाभिकीय ऊर्जा नहीं, तो फि र पर्यावरण में आ रही गिरावट को रोकने के लिए आप क्या सुझाव देंगे?
सद्‌गुरुसद्‌गुरु: अगर आप उन तरीकों को देखें जिनसे आज हम इस धरती पर ऊर्जा पैदा कर रहे हैं, तो आप पाएंगे कि थर्मल प्लांट सबसे ज्यादा हैं और एक हिस्सा पनबिजली यानी हाइड्रोइलेक्ट्रिक का है। एक समय हमें लगता था कि पानी की ताकत का इस्तेमाल करते हुए ऊर्जा पैदा करना सबसे सस्ता और सुरक्षित तरीका है और इससे प्रदूषण भी नहीं फैलता। अब हम इसका विरोध करने लगे हैं, क्योंकि हमें अहसास हो गया है कि अगर आप बहुत ज्यादा बांध बनाएंगे तो यह खतरनाक हो सकता है। इसलिए अब हम इसके खिलाफ बात कर रहे हैं। एक समय था जब हर कोई पानी से बनने वाली बिजली के लिए अभियान चला रहा था। क्योंकि इससे कोई धुंआ बाहर नहीं निकलता, कोई मशीन नहीं चलती बस सहज रूप से पानी बहता रहता है। हां, पानी को थोड़ा रोकना पड़ता है, बांध बनाने पड़ते हैं, लेकिन इससे कई सालों तक बिजली पैदा होती रहती है। हां, इसके लिए आपको बारिश के देवता को प्रसन्न करना पड़ता है। दो गधों की शादी करानी पड़ती है। देश के कुछ हिस्सों में ऐसी मान्यता है कि अगर आप दो गधों की शादी करा दें तो बारिश हो जाती है। लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है कि इतने सारों की शादी हो रही है लेकिन बारिश तो होती ही नहीं।

कैसे पेड़ ऐसा वातावरण बनाने में मदद करते हैं जिसमें ध्यान आसानी से लगाया जा सकता है।
क्या पेड़ ध्यान लगाने में मदद कर सकते हैं?

तो अब हम इसका विरोध करने लगे हैं, क्योंकि अब हमें पता चल गया है कि इससे कैसा नुकसान हो सकता है। फि र हमने सोचा कि हम कोयला, गैस या तेल जलाएंगे और बिजली पैदा करेंगे। थोड़ा बहुत धुंआ ही तो आकाश में जाता है। आकाश तो असीमित है, उससे भला क्या फ र्क पड़ेगा! लेकिन हमें पता चला कि इससे भी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं। अब हम नाभिकीय ऊर्जा के बारे में बात कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इससे कोई धुंआ बाहर नहीं आ रहा है, लेकिन आप इस सृष्टि के बुनियादी निर्माण सामग्री से खेल रहे हैं। परमाणु इस रचना की मूल निर्माण सामग्री है और आप उसके साथ खेल रहे हैं। भले ही इससे धुंआ नहीं निकलता, लेकिन इसके अपने परिणाम होंगे। अगर किसी चीज से धुंआ नहीं निकलता है तो ऐसा मत सोचिए कि वह खतरनाक नहीं है।

कहानी हमिंग बर्ड की 

एक कहानी है – एक गुंजन करने वाले पक्षी की, जिसे हमिंग बर्ड भी कहते हैं। सर्दियों का मौसम था। एक छोटी सी हमिंग बर्ड हवा में उड़ रही थी। वह उत्साह में थोड़ी ज्यादा ऊंचाई तक चली गई। वहां मौसम बहुत ठंडा था। उसके पंख जम गए और वह गिर गई। वह ठंड से मरने ही वाली थी कि उधर से गुजर रही एक गाय ने उस पर गोबर कर दिया, जो बिल्कुल चिडिय़ा के ऊपर आकर गिरा। गोबर की गर्मी ने ठंड से मरती हुई उस चिडिय़ा के लिए संजीवनी का काम किया। चिडिय़ा को कुछ आराम महसूस हुआ और वह गोबर से बाहर आने के लिए फ डफ़ ड़ाने लगी। उधर से एक बिल्ली गुजर रही थी। जब उसने चिडिय़ा को फ डफ़ ड़ाते देखा तो उसने उसे गोबर से बाहर निकाल दिया। इसके बाद बिल्ली को लगा कि यह चिडिय़ा तो उसके लिए अच्छा नाश्ता है, सो उसने उसे खा लिया। कहानी का संदेश यह है कि हर वह शख्स जो आप पर गंदगी फेंकता है, आपका दुश्मन नहीं है और हर वह शख्स जो आपको गंदगी से बाहर निकालता है, आपका दोस्त नहीं हो सकता।

तो क्या नाभिकीय ऊर्जा सबसे बेहतर विकल्प है? अभी तक हमने वह नुकसान देखा ही नहीं है जो असल में नाभिकीय ऊर्जा कर सकती है। अगर आप यह सब पर्यावरण संबंधी नजरिये से पूछ रहे हैं और धरती पर इसके दूरगामी प्रभावों को जानना चाहते हैं तो निश्चित रूप से यह अक्लमंदी भरा फैसला नहीं होगा।

तो क्या नाभिकीय ऊर्जा सबसे बेहतर विकल्प है? अभी तक हमने वह नुकसान देखा ही नहीं है जो असल में नाभिकीय ऊर्जा कर सकती है। अभी हमें यह एक अच्छे समाधान की तरह लग रही है। आज के वक्त में भारत अपनी ऊर्जा संबंधी जरूरतों को पूरा कर पाने में अक्षम है। यह हमारे विकास में एक बाधा है। तो नाभिकीय ऊर्जा उन समस्याओं को हल कर देगी और हमारी आर्थिक व्यवस्था को बेहतर बना देगी। लेकिन अगर आप यह सब पर्यावरण संबंधी नजरिये से पूछ रहे हैं और धरती पर इसके दूरगामी प्रभावों को जानना चाहते हैं तो निश्चित रूप से यह अक्लमंदी भरा फैसला नहीं होगा। हमने कुछ छोटी-मोटी दुर्घटनाएं देखी हैं जिनमें सैकड़ों लोगों की जानें गईं, लेकिन वह कुछ भी नहीं है। जब वास्तव में बड़ी चीजें होंगी, तो नुकसान बहुत बड़ा होगा। अब तो लोग एक दूसरे की नाभिकीय सामग्री पर बम गिराने की सोच रहे हैं। अब आप समझ सकते हैं कि चीजें पहले ही कितनी खराब हो चुकी हैं।

कडलोर जिले के पलयापटनम गांव की एक सेवानिवृत्त प्रिंसिपल कस्तूरी अपनी दिलचस्प कहानी साझा कर रही हैं। जानते हैं कि कैसे उन्होंने और उनके पति ने मिलकर एक बंजर जमीन को एक छोटे जंगल में बदल दिया।
बंजर जमीन को उपजाऊ बनाने की एक दास्‍तान

उर्जा सूर्य की 

इसमें कोई शक नहीं कि दुनिया में ऊर्जा की जरूरत तेजी के साथ बढ़ रही है। कहीं न कहीं से आपको इसे पैदा तो करना ही होगा। अब सवाल यह है कि ऊर्जा की समस्या का हल क्या है? इस धरती के लिए ऊर्जा संबंधी हल खोजने की हम कोशिश क्यों कर रहे हैं?
इस धरती को गर्म रखने के लिए, इसका पोषण करने के लिए, पेड़ पौधों के बढऩे के लिए और धरती पर मौजूद जीवन को चलाने के लिए जरूरी ऊर्जा का जो विचार आया है, वह सूर्य से आया है। आज भी ऊर्जा का सबसे अच्छा साधन सूर्य ही है। मैंने इस बारे में पहले भी कई बार बात की है और हाल ही में मैंने देश के एक बड़े कॉरपोरेट लीडर को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे सौर ऊर्जा को उपयोग करने के काबिल बनाएं। वह सौर ऊर्जा को भारत में बड़ी चीज बनाना चाहते हैं और इस परियोजना में करीब एक अरब डॉलर लगा भी चुके हैं। मुझे लगता है कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में जर्मनी काफी काम कर चुका है। आज वे जिस तरह के सोलर पैनल बना रहे हैं, वे उन सोलर पैनल के मुकाबले 18 गुना ज्यादा प्रभावशाली हैं, जो हम आमतौर पर देखते हैं। किसी ने एक बात कही है, हालांकि मुझे नहीं पता कि यह कितनी सही है, किसी ने कहा है कि अगर दस हजार वर्ग किलोमीटर का एक चौकोर पैनल अमेरिका के उटा रेगिस्तान में लगा दिया जाए तो वह पूरे देश की जरूरतों को पूरा कर देगा। मुझे नहीं पता कि इसमें कितनी सच्चाई है, लेकिन ऐसा किसी ने कहा है। चलिए दस हजार वर्ग किमी न सही, बीस हजार वर्ग किमी ही सही, लेकिन यह पूरी तरह से साफ सुथरी ऊर्जा होगी। दस हजार वर्ग किमी एक बड़ा क्षेत्र लगता है, लेकिन अगर आप तमाम थर्मल, हाइड्रो और नाभिकीय ऊर्जा संबंधी क्षेत्रों को एक साथ जोड़ लें और तमाम तरह के पेड़ पौधों को भी शामिल कर लें, तो आप उस क्षेत्र के दस गुना क्षेत्र को घेरे हुए हैं। लोगों को यहां काम करना पड़ता है, धुंआ उठता है और उसके अपने नुकसान होते हैं। देश की सीमा के भीतर हम हमेशा ही इसका कोई न कोई हल ढूंढने की कोशिश करते रहते हैं।

मिल कर आगे बढें 

अगर सभी देश मिलकर अपने संसाधनों का उपयोग करें और एक बड़ा सा सोलर पैनल बादलों के ऊपर तैयार कर दें, तो कितना अच्छा हो। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। इस वातावरण के अंदर ही, बादलों के ऊपर इस सोलर पैनल को लगाएं और इसकी ऊर्जा को नीचे पहुंचाने की व्यवस्था कर लें, जो कि संभव है। ऐसा करने के तरीके लोगों ने ईजाद कर लिए हैं। इससे ये सोलर पैनल हमेशा सूर्य के सामने होंगे। अगर इन्हें सूर्य की सीध में लगाया जाए और जरूरत के अनुसार इसे घुमाया जा सके, तो सभी चीजों को आसानी से संभाला जा सकता है। नाभिकीय या थर्मल प्लांट की बात तो छोड़ ही दें, बिना एक स्टोव जलाए भी इससे पूरी धरती को प्रकाशमान बनाया जा सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि बहुत सारे लोगों को समाधान चाहिए ही नहीं, क्योंकि वे समस्याओं से ही फल फूल रहे हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो ऐसी समस्याओं की वजह से बहुत संपन्न हैं। वे चाहते ही नहीं कि समस्याएं खत्म हों। वे समस्याएं चाहते हैं क्योंकि ये उन्हें और अमीर बनाती हैं।

दुनिया के नेता जिस तरीके से सोचते हैं, उसमें एक तरह के बदलाव की जरूरत है। फिर ऊर्जा कोई बड़ी समस्या नहीं रह जाएगी, क्योंकि हमारे पास ऊर्जा का इतना बड़ा स्रोत मौजूद है और वह हमारी मदद के लिए लगातार जल रहा है। बस हमें यह समझना है कि इस ऊर्जा को कैसे संजोया जाए। हमें देखना है कि इसमें पैसा, संसाधन और बुद्धि का कैसे प्रयोग किया जाए। वैसे यह सब हम जानते हैं, बस इसे थोड़ा तेज करने की जरूरत है। सौर ऊर्जा ही असली भविष्य है और मुझे लगता है कि इस विचार से पूरी दुनिया सहमत है।

तो क्या नाभिकीय ऊर्जा सबसे बेहतर विकल्प है? अभी तक हमने वह नुकसान देखा ही नहीं है जो असल में नाभिकीय ऊर्जा कर सकती है। अगर आप यह सब पर्यावरण संबंधी नजरिये से पूछ रहे हैं और धरती पर इसके दूरगामी प्रभावों को जानना चाहते हैं तो निश्चित रूप से यह अक्लमंदी भरा फैसला नहीं होगा।


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