भारतीय समाज: क्‍यों बंटा था अलग-अलग जातियों में

भारतीय समाज: क्‍यों बंटा था अलग-अलग जातियों में
भारतीय समाज: क्‍यों बंटा था अलग-अलग जातियों में

सद्‌गुरुभारत में जाति व्यवस्था अन्यायपूर्ण और अनुचित लगती है – लोगों को पेशे या जन्म के आधार पर क्यों बांटा जाए? मगर क्या हमेशा से ऐसा ही था? और जाति व्यवस्था को खत्म करने से क्या आज उससे जुड़ी सारी समस्याएं हल हो सकती हैं?

 

सद्‌गुरु:

भारतीय जाति व्यवस्था को इस तरह समझा जा सकता है: वर्णाश्रम धर्म में चार मूल जातियां हैं। एक है शूद्र, जो छोटे और तुच्छ काम करता है, वैश्य जो व्यापार करते हैं, क्षत्रिय, जो समुदाय या देश की रक्षा करते हैं और शासन चलाते हैं और ब्राह्मण, जो उस समाज की शिक्षा और आध्यात्मिक प्रक्रिया का ख्याल रखते हैं।

भारतीय जाति व्यवस्था की चार श्रेणियां

सामाजिक ढांचे की चार श्रेणियों में वर्गीकरण को अलग-अलग संदर्भों में समझा जा सकता है। उसे देखने का एक तरीका यह है कि जिन लोगों ने अपने जीवन की जिम्मेदारी नहीं ली या जिन्होंने अपने जीवन के हालातों की जिम्मेदारी नहीं ली, ऐसे लोगों को शूद्र कहा गया। वह सिर्फ अपने जीवित रहने की जिम्मेदारी लेता है, और किसी चीज की नहीं। वैश्य वह होता है जो अपनी, अपने परिवार और अपने समुदाय की जिम्मेदारी लेता है। इसलिए व्यापार का काम उसे दिया गया। आज, सारी व्यवस्था, कारोबार का सारा माहौल बहुत अलग है मगर उन दिनों व्यापारी वह होता था, जो अनाज और लोगों के जरूरत की सभी चीजों को गोदाम में भर कर रखता था।

जब लोगों की आबादी बढ़ी और हजारों लोहार हो गए, तो स्वाभाविक रूप से उनके खाने, शादी करने और चीजों को करने का अपना तरीका हो गया, इसलिए उन्होंने एक जाति बना ली। अगर आप इसे एक स्तर पर देखें, तो इसमें वाकई कोई बुराई नहीं है।
इन चीजों की कमी पड़ने पर वह ये चीजें समुदाय को देता था। इसलिए हर समाज में वैश्य होते थे जो जीवन के इस पहलू का ध्यान रखते थे। वे माल जमा कर के रखते थे और जरूरत पड़ने पर उसे निकालते थे। ये ऐसे लोग थे जो अपने परिवार और कुछ सीमा तक अपने आस-पास के छोटे समुदाय की जिम्मेदारी लेते थे। क्षत्रिय वे लोग थे जो सारे समुदाय या देश की जिम्मेदारी उठाते थे। वे अपने देश और समुदाय की रक्षा के लिए शस्त्र चलाते थे और लोगों की रक्षा में मरने के लिए तैयार थे। उनके पास प्रशासन की जिम्मेदारी थी और सेना भी उन्हीं के पास होती थी।

ब्राह्मणों को शिक्षा की जिम्मेदारी दी गई। आध्यात्मिक प्रक्रियाएं और धर्म उनके पास था क्योंकि ‘ब्राह्मण’ शब्द खुद इससे निकला है। वह ऐसा व्यक्ति होता है, जिसे ज्ञान हो गया हो कि वह ब्राह्मण या ‘दिव्य’ है। इसलिए ब्राह्मण का मतलब जिम्मेदारी की चरम भावना, जिम्मेदारी की असीमित भावना है। जिस व्यक्ति के अंदर जिम्मेदारी की असीमित भावना हो, उसी को शिक्षा और धर्म का क्षेत्र संभालना चाहिए क्योंकि इन दोनों को किसी भी समाज का सबसे अहम पहलू माना जाता है।

फर्क बनाम पक्षपात

इसी के अनुसार भारत में जाति व्यवस्था बनाई गई थी। उन दिनों के लिए यह एक अच्छी व्यवस्था थी। बस कुछ समय बाद आप अपने काम से नहीं बल्कि जन्म से ब्राह्मण बनने लगे, तभी समस्या शुरू हुई। हर व्यवस्था में ऐसा ही होता है। हम जो भी व्यवस्था बनाते हैं, उसे साफ-सुथरा बनाए रखने के लिए और अच्छी तरह चलाने के लिए हमें लगातार मेहनत करनी चाहिए, वरना हर व्यवस्था चाहे वह शुरुआत में कितनी भी अच्छी हो, शोषण का कारण बन सकती है।

समय के साथ, मानव समाज ने हर अंतर को पक्षपात में बदलने की कोशिश की है। भिन्नताओं में कोई बुराई नहीं है। दुनिया में भिन्नता होनी ही है और यह अच्छी बात है कि यह भिन्न है, मगर हम हर भिन्नता या फर्क को पक्षपात में बदलने की कोशिश करते हैं चाहे वह नस्ल हो, धर्म या लिंग। इसलिए जब हम अपना विवेक खो बैठे और हर चीज को पक्षपातपूर्ण बनाना शुरू कर दिया, तो भारतीय जाति व्यवस्था एक बदसूरत व्यवस्था बन गई। जो कभी समाज में कुशलता या हुनर को आगे बढ़ाने का एक बहुत सटीक तरीका था, वह बदकिस्मती से उपयोगी न रह कर पक्षपाती और नकारात्मक हो गया। जब कोई आईआईटी या आईटीआई नहीं थे, जब कोई प्रशिक्षण केंद्र नहीं था, तब आपका परिवार ही आपको प्रशिक्षण देने का इकलौता जरिया था, है न? इसलिए एक लोहार समुदाय, एक सुनार समुदाय या एक मोची समुदाय को बनाए रखना बहुत अहम था वरना समाज में कोई कौशल नहीं होता।

 

भारतीय जाति व्यवस्था: प्रशिक्षण की विधियां

भारत में जाति व्यवस्था की शुरुआत उस समय हुई जब किसी खास पेशे के लिए किसी औपचारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं थी। मान लीजिए, आपके पिता एक लोहार थे, तो 6 साल की उम्र में जैसे ही आप तैयार हुए, आपने हथौड़े और निहाई से खेलना शुरू कर दिया। जब तक आप 8 साल के हुए, आपके पिता ने देखा कि आप वैसे भी उसे चलाना चाहते थे, तो बेहतर है कि उसे किसी मकसद से चलाया जाए। जब तक आप 12 साल के हुए, आप काम करने लगे। 18 या 20 साल का होते-होते आपके पास एक हुनर या निपुणता थी जिससे आप अपनी रोजी-रोटी कमा सकते थे।

 

इसलिए अगर आपके पिता लोहार होते थे, तो आप लोहार बनते थे, अगर आपके पिता सुनार थे, तो आप सुनार बनते थे। हर पेशे में परिवार के ढांचे के भीतर प्रशिक्षण की अपनी व्यवस्था थी क्योंकि परिवार इकलौता प्रशिक्षण केंद्र था। समाज में सभी शिल्प, पेशे और हुनर इसी तरह आगे बढ़ सकते थे। अगर आप लोहार हैं, तो आप जाकर सुनार का काम करने की कोशिश नहीं करते, आप बस लोहार का काम करते हैं क्योंकि समाज में लोहार की जरूरत है।

उसे देखने का एक तरीका यह है कि जिन लोगों ने अपने जीवन की जिम्मेदारी नहीं ली या जिन्होंने अपने जीवन के हालातों की जिम्मेदारी नहीं ली, ऐसे लोगों को शूद्र कहा गया। वह सिर्फ अपने जीवित रहने की जिम्मेदारी लेता है, और किसी चीज की नहीं।
जब लोगों की आबादी बढ़ी और हजारों लोहार हो गए, तो स्वाभाविक रूप से उनके खाने, शादी करने और चीजों को करने का अपना तरीका हो गया, इसलिए उन्होंने एक जाति बना ली। अगर आप इसे एक स्तर पर देखें, तो इसमें वाकई कोई बुराई नहीं है। यह बस समाज की सुविधा के लिए एक किस्म की व्यवस्था थी। एक लोहार और सुनार के बीच, उनके हथौड़ों में, उनके काम करने के तरीके, उनके रूप-रंग, उनके खान-पान की चीजों और तरीकों में सब कुछ स्वाभाविक रूप से भिन्न था क्योंकि दोनों के काम का प्रकार बहुत भिन्न था।

 

समय के साथ यह शोषण का एक जरिया बन गया। हमने कहना शुरू कर दिया कि जो आदमी मंदिर चलाता है, वह स्कूल चलाने वाले आदमी से बेहतर है। जो आदमी स्कूल चलाता है, वह लोहार की दुकान चलाने वाले आदमी से बेहतर है। ये सब भिन्नताएं हैं, हर किसी को कुछ न कुछ करना है। मगर हमने भिन्नताओं या फर्क को समय के साथ पक्षपात बना दिया। अगर हम सिर्फ फर्क को बनाए रखते, तो हमारी संस्कृति बहुत बढ़िया, विविधता से भरी होती मगर हमने उसे पक्षपाती बना दिया।

 

जाति व्यवस्था के कई प्रकार

इंसान हर फर्क को पक्षपाती इसलिए बना देता है क्योंकि हर इंसान अभी जो है, उससे थोड़ा और ज्यादा होना चाहता है। इसका एक दुर्भाग्यपूर्ण तरीका उसने यह खोजा है कि अपने सामने वाले व्यक्ति को नीचा दिखाया जाए। उसकी चाह दरअसल कुछ ज्यादा महसूस करने की है, मगर वह नहीं जानता कि खुद को बेहतर कैसे बनाना है तो उसे यही बेहतर लगता है कि किसी और को नीचा दिखाया जाए। यह बहुत बुनियादी दिमाग है मगर हमने लंबे समय तक उस तरह काम किया है और हम उसी तरह काम करना जारी रखे हुए हैं। अब उसे बदलने का समय है मगर सिर्फ पुरानी जाति व्यवस्था को खत्म करते हुए उसे बदलना संभव नहीं है। वह हजारों दूसरे तरीकों से खुद को मजबूत कर लेगा। जैसे, क्या आपको लगता है कि न्यूयार्क सिटी में कोई जाति व्यवस्था नहीं है? वहां शिक्षा या आर्थिक क्षमताओं पर आधारित अलग तरह की जाति व्यवस्था है, ये सब चीजें अपनी तरह के पक्षपाती समूहों को पैदा करती हैं। इसलिए जब तक कि हम मानव दिमाग में पूरी तरह बदलाव नहीं लाते, इसे बदलना संभव नहीं है।

 

अगर हर इंसान में सभी को खुद में शामिल करने की भावना न हो, तो जो व्यवस्था वे बनाते हैं या जो काम वे करते हैं, वह सभी को अपने अंदर नहीं समेट सकते। अगर लोग इस समग्रता का अनुभव नहीं करते, तो वे बिल्कुल अलग-अलग प्रक्रियाएं शुरू कर देते हैं। आध्यात्मिक प्रक्रिया का एक मूल पहलू यह है कि यह एक व्यक्ति को समग्र इंसान बना देती है। साथ ही यह व्यक्ति को अधिक निपुण, अधिक काबिल, अधिक संतुलित और बदले में अधिक उपयोगी बनाने के लिए तैयार करती है।

 

 


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