भारत क्या भेंट कर सकता है दुनिया को?

‎स्वतंत्रता
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सद्‌गुरुसद्‌गुरु बता रहे हैं कि भारत किस तरह दुनिया की महाशक्ति बन सकता है। इसके लिए दुनिया को जीतने की नहीं, बल्कि सभी को खुद में शामिल करने की जरूरत होती है।

सद्‌गुरु:

1992 में भारत रत्न पुरस्कार मिलने के बाद जेआरडी टाटा ने कहा था, ‘मैं भारत को एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में नहीं देखना चाहता। मैं भारत एक खुशहाल देश  के रूप में देखना चाहता हूं।’

आज सिर्फ उसका ही सम्मान किया जा रहा है जिसके पास ताकत है। इसकी वजह यह है कि हमने ऐसी दुनिया नहीं बनाई, जहां सौम्यता की, भद्रता की इज्जत की जाए। लेकिन सोचने की बात यह है कि क्या शक्ति, धन-दौलत इकट्ठा करने का यह पागलपन हमें खुशहाल बना रहा है? भारत पर अब दुनिया भर की नजर है। इस बात का ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है कि हम दुनिया के सामने अपनी कैसी छवि पेश कर रहे हैं, हमारे पास दुनिया को देने के लिए क्या है।

ज्ञानियों को पैदा करने की तकनीक

हम भूल गए हैं कि भारतीय संस्कृति का मर्म या सारतत्व हमेशा इंसान की मुक्ति या मोक्ष रहा है। किसी दूसरी संस्कृति ने इंसान को इतनी गहराई और समझ के साथ नहीं देखा और उसे अपनी चरम प्रकृति तक विकसित होने के तरीके नहीं बनाए। साफ और खुले तौर पर कहें तो हमारे पास ज्ञानी बनाने की तकनीकें हैं। पश्चिमी समाज राजनीतिक, सामाजिक और शारीरिक मुक्ति की बात करते हैं, मगर हमने हमेशा चरम मुक्ति या मोक्ष को अपना सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य माना है।

हमें यह समझने की जरूरत है कि यह भारतीय आध्यात्मिक चरित्र किसी विश्वास या मत प्रणाली से जुड़ा नहीं है। इसका संबंध उन प्रणालीबद्ध अभ्यासों से है जिन्हें हजारों सालों में इतने बौद्धिक और शानदार तरीके से बनाया गया था कि वे एक खास तरीके से मन और शरीर को मांजते थे।

एक देश के रूप में हमें दुनिया के सामने उदाहरण बनना चाहिए कि जब हम आजादी की बात करते हैं, तो हमारा मतलब चरम मुक्ति होता है: हर चीज से आजादी, पक्षपात या पूर्वाग्रह से आजादी, भय से आजादी, मृत्यु से आजादी।
यही वजह है कि आज के सूचना और प्रौद्योगिकी युग में भी यह देश इतनी सहजता से आगे की ओर बढ़ रहा है। भारत एक देश के रूप में बहुत अनोखा है। ऐसा चरित्र और गुण आपको कहीं और नहीं मिलेगा। जिस जनसमूह को हम भारत कहते हैं, उसका एक खास आयाम रहा है – एक खास जागरूकता और ज्ञान, जो कहीं और मिलना मुश्किल है। लोग जब भी भीतरी खुशहाली के बारे में सोचते हैं, तो पूरब की ओर देखते हैं। क्यों न भारत यह कामना और कोशिश करे की दुनिया का हर देश ध्यान करना सीखे?

तभी मैं ‘योग’ की बात कर रहा था। योग से मेरा मतलब उन तमाम मुद्राओं से नहीं है, जिनमें लोग महारत हासिल करना चाहते हैं। मैं एक पद्धति, एक संपूर्ण तकनीक के रूप में योग की बात कर रहा हूं जो आपके अंदर समावेश की एक भावना ले आता है, जिससे आप हर चीज और हर इंसान को अपना एक हिस्सा समझने लगते हैं। यह आखिरकार आपको उन हकीकतों का एक स्पष्ट बोध कराता है, जिसमें आप मौजूद होते हैं।

विजय बनाम समावेश

किसी इंसान या किसी चीज को अपना बनाने के दो तरीके होते हैं – पहला उसे जीत कर और दूसरा उसे खुद में समावेशित कर। समावेश योग का तरीका है, जबकि जीत बदकिस्मती से आधुनिक विज्ञान का तरीका बन गया है। हमें जीवन की उपलब्धियों के बारे में गलतफहमी है। क्या किसी को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर जीत एक उपलब्धि है या इस तरह समावेश करना उपलब्धि है, कि कोई आपसे प्रेम करने लगे? खास तौर पर बच्चों के दिमाग में भरे उपलब्धि या कामयाबी के नासमझी भरे विचारों को हमें बदलना होगा। हालांकि जबरन कुछ पाने की कोशिश ज्यादा कामयाब होती है, मगर यह बहुत असभ्य तरीका है। समावेश और सौम्यता में ही जीवन की प्रक्रिया फलती-फूलती है।

हम भूल गए हैं कि भारतीय संस्कृति का मर्म या सारतत्व हमेशा इंसान की मुक्ति या मोक्ष रहा है। किसी दूसरी संस्कृति ने इंसान को इतनी गहराई और समझ के साथ नहीं देखा और उसे अपनी चरम प्रकृति तक विकसित होने के तरीके नहीं बनाए।
इसलिए हमारी हसरत स्पष्टता से काम करने वाला और जहां तक संभव हो, अपने साथ-साथ दुनिया में हर किसी के लिए खुशहाली लाने वाला देश बनने की होनी चाहिए। बदकिस्मती से दो सदियों तक घोर गरीबी ने हमारे आध्यात्मिक मूल्यों को विकृत कर दिया है। यह हर पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि उसे फिर से अपने सही आकार में लाए ताकि वह फिर से दुनिया के सामने अपनी जबर्दस्त संभावना को दर्शाते हुए इंसान की मुक्ति का एक कारगर उपकरण बन जाए।

इस संस्कृति के लिए अब समय आ गया है कि वह खुद को एक बार फिर से व्यक्त और पुन:स्थापित करे। विदेशी आक्रमणों और गरीबी के कारण हमारी संस्कृति में जो विकृतियां आई हैं, उसने अभी भी आध्यात्मिक डोर को नष्ट नहीं किया है। बेशक इसने हमें सत्ता और दौलत का भूखा बना दिया है। एक देश के रूप में हमें दुनिया के सामने उदाहरण बनना चाहिए कि जब हम आजादी की बात करते हैं, तो हमारा मतलब चरम मुक्ति होता है: हर चीज से आजादी, पक्षपात या पूर्वाग्रह से आजादी, भय से आजादी, मृत्यु से आजादी। उस फोकस को स्थापित करना आज सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि हर इंसान काफी हद तक बाहरी तत्वों की वजह से उलझता है। भय मानव बुद्धि को कई तरह से बाधित करता है। मगर एक बार जब कोई इंसान मुक्ति का चरम लक्ष्य तय कर लेता है, तो उसके लिए और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं होता। वह एक गहन समझ के साथ और जिम्मेदारी की एक भावना के साथ अपना जीवन जीता है। हमें दुनिया में मौजूद गला काट प्रतिस्पर्धा के हालातों का विपरीत उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। हमें ऐसा समाज स्थापित करना चाहिए, जिसकी इज्जत उसकी आक्रामकता या दौलत के कारण नहीं, बल्कि जीवन के ज्ञान के कारण हो। जब तक हम भद्रता, सौम्यता का सम्मान करना नहीं सीखेंगे, दुनिया कभी इस तरह के विकास के बारे में नहीं जान पाएगी।


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