हमारी उम्‍मीदों पर दूसरे क्‍यों नहीं खरे उतरते?

उम्मीदों पर

सद्‌गुरुसद्‌गुरु हमें बता रहे हैं कि अगर हम इसलिए परेशान हैं कि लोग हमारी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते तो हमें खुद को ठीक करने की जरुरत है।

पूर्ण स्वीकार की भावना से बनते हैं रिश्ते

अपने रिश्तेदारों और परिजनों में किसी को भी बुरे व्यक्ति के रूप में देखना बहुत आसान है। ‘मेरे पिता पियक्कड़ हैं’, ‘मेरे पति गुस्सैल हैं’, ‘मेरा बेटा फरेबी है’, ‘मेरी सास बड़ी जालिम है’ ऐसा कहने वाले कई लोग मिलेंगे।

अपने दिल को छूकर बताइए, क्या आप दिन के चौबीसों घंटे नेक और ईमानदार रहते हैं? आपकी खुशी किसी एक चीज में है, उनकी खुशी किसी और चीज में, बस। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि वे गैरजिम्मेदारी बरतें। लेकिन उनकी आदतों और चाल-चलन को देखकर उस आधार पर ही उनके साथ रिश्ता मान्य होगा, आपका यह विचार ठीक नहीं है, मैं यही कहना चाहता हूं।  फायदा होने पर ही किसी को स्वीकार करना, नहीं तो उसका तिरस्कार करना परिवार का लक्षण नहीं है। वह तो व्यापार है, लेन-देन का व्यापार।

परिवार का मतलब क्या है? बस थोड़े से लोगों को अपनों के रूप में स्वीकार करना ही सच्चे मायने में परिवार है।

फायदा होने पर ही किसी को स्वीकार करना, नहीं तो उसका तिरस्कार करना परिवार का लक्षण नहीं है। वह तो व्यापार है, लेन-देन का व्यापार। 
उनकी सफलता-असफलता का ख्याल किए बिना, वे स्वस्थ हैं या बीमार इस तरह के विचारों पर गए बिना, खुद को उनके साथ जोड़े रखना ही परिवार के सही मायने हैं। आपके परिवार का कोई सदस्य यदि गलत राह पर चल रहा हो, तो उसे बचाना आपकी जिम्मेदारी बनती है।

एक बार शंकरन पिल्लै मूंगा देखने के लिए तैराकी का लिबास पहनकर समुंदर में उतरे। बीस फुट की गहराई में किसी आदमी को बिना किसी सेफ्टी कॉस्ट्यूम के आते देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। साठ फुट की गहराई में भी उसे सेफ्टी कॉस्ट्यूम या आक्सीजन का मुखौटा पहने बिना साथ में आते देखकर शंकरन पिल्लै हैरान हुए। ‘यह कैसे मुमकिन है?’ यों पानी में न घुलने वाली स्याही में लिखकर पूछा। सामने वाले ने कलम छीनकर उत्तर लिखा ‐ ‘मैं डूब रहा हूं, बेवकूफ ! मुझे बचाने की कोशिश किए बिना सवाल किये जा रहे हो?’

आप भी शंकरन पिल्लै की ही तरह हैं। डूबते व्यक्ति को तमाशे के रूप में देख रहे हैं। परिवार से अलग हो जाना चाहते हैं, या उन्हें अलग कर देना चाहते हैं। शहर में बड़ी कमाई करने वाला एक नौजवान मेरे पास आया। ‘मेरे पिता अनपढ़ किसान हैं। उन्हें पता नहीं कि सभ्यता क्या चीज है। मेरे दोस्तों के सामने बकवास करते रहते हैं। इससे मुझे जलील होना पड़ता है’ अपने पिता के बारे में अभद्रतापूर्ण शब्दों में बोला।

मैंने पूछा, ‘पहले तो आप इस बात को भूल गए कि आप भी अपने मां-बाप की मूर्खता से पैदा हुए व्यक्ति हैं। ‘मैं भी इसी भूल से पैदा हुआ हूं’ इस तथ्य को समझने की अक्लमंदी भी आपके पास नहीं है। तो बेवकूफ आप हैं या वे? चाहें तो इस तरह के व्यक्ति को जन्म देने की उनकी मेहनत को बेवकूफी कह सकते हैं।’

उम्मीदों के अनुसार न होने पर कमियाँ दिखती हैं हमें

जो लोग हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं होते, वे हमें बेवकूफ दिखाई देते हैं। आप इस बात को मत भूलिए कि इसी कारण से आपको भी बेवकूफ के रूप में देखने वाले सौ लोग होंगे।

जो लोग हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं होते, वे हमें बेवकूफ दिखाई देते हैं। आप इस बात को मत भूलिए कि इसी कारण से आपको भी बेवकूफ के रूप में देखने वाले सौ लोग होंगे। 

आप शहर में पले बढ़े हैं। फर्राटे से अंग्रेजी बोलते हैं। कंप्यूटर जैसी कुछ मशीनों को चलाने की कला सीख गए हैं। लेकिन इन सब चीजों के बूते पर क्या अपने को बड़ा बुद्धिमान मानते हैं?

क्या आप गाय के थनों से उनकी तरह दूध दुह सकते हैं? पांव पर चोट खाए बिना हल को कम-से-कम एक फुट तक चलाना आता है? अगर आपसे यह सब नहीं हो सकता तो क्या आपके ऊपर मूर्ख का ठप्पा लगा दें? आपने ज्यादा से ज्यादा खेती के बारे में किताबों में पढ़ा होगा। उन्होंने उसे खेत में पढ़ा है। उनका ही तो अनुभव सीधा है, गहरा है।

अपनी बनिस्बत अपने बेटे को बेहतर स्थिति में लाना है – इस विचार के साथ आपको शहर की शिक्षा और सुविधाएं मुहैया कराने वाले वे लोग अक्लमंद हैं या आप? यदि आप वास्तव में चाहते हैं कि इसके बदले में उन लोगों को अच्छी हालत में ले आना है तो उन्हें बेवकूफों की तरह न देखकर उनके प्रति स्नेह दिखाते हुए जो आप जानते हैं उसे उनके साथ बांट लीजिए।

आप एक माहौल में रहते हैं, वे लोग दूसरे माहौल में बस। इसमें बुद्धिमानी की बात कुछ भी नहीं है। मूर्खता की बात भी नहीं है। आपके मातहत काम करने वाला या आपके परिवार का कोई छोटा सदस्य आपके प्रति आदर नहीं दिखाता, क्या इस बात को लेकर दुखी होने वाले व्यक्ति हैं आप? तो फि र दुरुस्त किए जाने की जरुरत उन लोगों को नहीं, बल्कि आपको है।

खालीपन को भरने के लिए पैदा होती हैं उम्मीदें

एक बात समझ लीजिए। आपका जो ‘स्व’ है वह किसी भी सम्मान की उम्मीद नहीं करता। स्वाभिमान जैसी कोई चीज नहीं है। वह काल्पनिक मनोभाव है। आप दूसरों से किसलिए सम्मान की उम्मीद करते हैं? दूसरों का ध्यान आपकी तरफ  मुडऩा चाहिए, इसी उम्मीद के साथ न? सच्चार्ई यह है कि आज के मुकाम पर आप खुद में पूर्ण होने का एहसास नहीं कर पाते। सोचते हैं कि आप आधे-अधूरे हैं। उस खाली स्थान को भरने के लिए आपको दूसरों के ध्यान की जरूरत पड़ती है।

शंकरन पिल्लै अपने दोस्त के साथ टेनिस खेल रहे थे। ढोल-धमाकों के साथ उस तरफ  से कोई शवयात्रा जा रही थी। दोस्त झट से रुक गया। आंखें बंद किए हाथ जोडक़र शवयात्रा के निकल जाने तक इंतजार करता रहा। उसके बाद ही उसने खेलना शुरु किया। शंकरन पिल्लै ने कहा, ‘दूसरों के प्रति आप कितना आदर-भाव रखते हैं! आपका यह व्यवहार देखकर मैं गद्गद् हो गया।’

दोस्त ने कहा, ‘तीस साल तक जो महिला मेरे जीवन में साथ रही, उसके लिए इतना भी न करूं, तो कैसा लगेगा?’ क्या आप इस तरह का सम्मान चाहते हैं?अपने अधिकार या स्नेह के बल पर आदर या सम्मान की मांग करना, भीख मांगने के समान है। भोजन के लिए किसी के सामने हाथ फैला सकते हैं, संवेदना के लिए नहीं।


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