ये तो गंदगी का लेन-देन है

cultural exchange

प्रश्न: भारत के  युवा पश्चिमी  संस्कृति को अपना रहे हैं। क्या हमें इसे स्वीकार कर लेना चाहिए या इस चलन  को रोना चाहिए?

सद्‌गुरु:

आज का युवा जिस चीज के संपर्क में आ रहा है, वह पश्चिमी संस्कृति नहीं है। यह तो पश्चिमी संस्कृति की गंदगी है, यह उस संस्कृति की महत्वपूर्ण चीजें नहीं हैं। पश्चिमी संस्कृति की असली ताकत, उनकी काम के प्रति ईमानदारी, तार्किक क्षमता और उनका शिष्टाचार है। इनमें से कुछ भी हमारे युवा नहीं अपना रहे हैं। बस वहां की गंदगी यहां आ रही है। कोकाकोला, शराब, ड्रग्स और शोर-शराबा, जिसे आप संगीत कहने लगे हैं, बस यही सब तो वहां से आ रहा है।

पिछली पीढियां खासतौर से पिछली दो-तीन पीढियां अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह जताने में नाकाम रहीं हैं, कि हमारे पास जो सांस्कृतिक धरोहर है, वो कितना बेश कीमती है। क्योंकि अपनी धरोहर को खुद आपने ही कभी नहीं छुआ है।
हाल ही में एक सत्संग के दौरान वहां के लोगों ने मुझसे पूछा कि बहुत से भारतीय ‘हीलर’- जिसे आप किसी डॉक्टर की तरह समझ सकते हैं, अमेरिका आ रहे हैं और यहां लोगों को फायदा पहुंचा रहे हैं। आपकी इस बारे में क्या राय है? मैंने कहा – मुझे नहीं पता कि भारतीय हीलर यहां आ रहे हैं, क्योंकि मेरी जानकारी में तो बहुत से अमेरिकी हीलर भारत जा रहे हैं और वहां लोगों की तकलीफों को दूर कर रहे हैं। ऐसे में अगर भारतीय हीलर अमेरिका आ रहे हैं तो हो सकता है यह कोई सांस्कृतिक लेन-देन का कार्यक्रम हो, क्योंकि उन सबको पता चल गया है कि वे अपनी जनता के बीच प्रभावशाली नहीं हैं। एक असफल आदमी किसी नई जगह से ही काम कर सकता है। यह कोई सांस्कृतिक लेन-देन नहीं है, यह तो गंदगी का लेन-देन है। भारत की सबसे घटिया चीज अमेरिका जा रही है और अमेरिका की सबसे घटिया चीज भारत आ रही है।

ऐसा नहीं है कि युवा पीढ़ी अपने रास्ते से भटक रही है। पुरानी पीढ़ी को हमेशा ऐसा लगता है। हर पीढ़ी ऐसा ही सोचती है। आपके पिता ने आपके बारे में ऐसा सोचा, और आपके दादा ने आपके पिता के बारे में यही सोचा होगा और उनके भी पिता की अपने बच्चों के बारे में ऐसी ही सोच रही होगी। इसमें नया कुछ नहीं है। तो इसे लेकर परेशान मत होइए। बस यह समझने की कोशिश कीजिए कि युवा पीढ़ी भी अपनी पहचान बनाने की कोशिश में लगी है।

युवा का अर्थ है कि उनका निर्माण अभी पूरा नहीं हुआ है। वे अभी तक कुछ बन नहीं पाए हैं। जो लोग बनने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं, उनके पास उन लोगों की अपेक्षा अधिक संभावनाएं हैं, जो कुछ बन चुके हैं। आप कुछ बन कर उसी में अटक गए हैं जबकि वे अब भी संभावनाएं तलाश रहे हैं। चूंकि वे सभी संभावनाओं को नाप-तौल रहे हैं, इसलिए ऐसा लगता है कि वे उलझे हुए हैं। आापके माता-पिता ने भी यही सोचा होगा कि आप उलझे हुए हैं। जो लोग बड़े हो चुके हैं, वे यह नहीं समझ पाते कि बच्चे जो बड़े हो रहे हैं, वे अभी भी संभावनाएं तलाश रहे हैं।

सबसे बड़ी बात है, कि पिछली पीढियां खासतौर से पिछली दो-तीन पीढियां अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह जताने में नाकाम रहीं हैं, कि हमारे पास जो सांस्कृतिक धरोहर है, वो कितना बेश कीमती है। क्योंकि अपनी धरोहर को खुद आपने ही कभी नहीं छुआ है। आप खुद ही उन बातों को अपने जीवन में नहीं उतार पाए हैं। और अब आप पश्चिम की नकल की बातें कर रहे हैं, जबकि आपकी भी हर चीज अब पश्चिमी है। आपकी शर्ट पश्चिमी है, आपकी पैंट पश्चिमी है, आपके बालों का स्टाइल पश्चिमी है। आपका पश्चिमी करण सिर्फ उस सीमा तक हुआ, जहां तक आपने हिम्मत दिखाई। आज युवा पीढ़ी कुछ कदम और आगे जा रही है। वैसे भी नई पीढ़ी को वे कदम उठाने ही चाहिए, जिन्हें उठाने की हिम्मत पिछली पीढ़ी में नहीं थी। आपमें क्या बचा है जो भारतीय है? हो सकता है आप आज भी भारतीय खाना खा रहे हों और युवा पीढ़ी को जंक फूड पसंद आ रहा है। उन्हें मैक्डॉनल्ड पसंद है और आप अभी भी सांभर खा रहे हैं। मुझे बताइए, क्या कोई बड़ा फर्क है?

आप नई पीढ़ी को बस यहां के गुण दिखाइए, उन्हें बदलने की कोशिश मत कीजिए। उनसे यह मत कहिए – पिज़्ज़ा मत खाओ, डोसा खाओ। ऐसा कहने पर तो वे सिर्फ पिज़्ज़ा ही खाएंगे।
खास बात यह है कि हमें अपनी संस्कृति के खूबसूरत पहलुओं को उजागर करना चाहिए और गंदगी को साफ करना चाहिए। समय के साथ साथ हर संस्कृति में गंदगी इकट्ठी हो जाती है इसलिए पीढ़ी दर पीढ़ी हमें उसकी सफाई करते रहना चाहिए। अगर हम सफाई नहीं करेंगे तो गंदगी बढ़ती चली जाएगी। आपको अपनी संस्कृति की गहराई में जाना होगा और जो वाकई अनमोल हो उसे निकालना होगा।

अमेरिका में बसे भारतीयों की दूसरी पीढ़ी के कुछ युवा अब मेरे साथ वापस आ रहे हैं, क्योंकि उन्हें यहां की संस्कृति में भरपूर गुण नजर आते हैं। आप नई पीढ़ी को बस यहां के गुण दिखाइए, उन्हें बदलने की कोशिश मत कीजिए। अगर आप उन्हें यहां की संस्कृति की कीमत बताना नहीं जानते, तो कोई नहीं बदलेगा। उनसे यह मत कहिए – पिज़्ज़ा मत खाओ, डोसा खाओ। ऐसा कहने पर तो वे सिर्फ पिज़्ज़ा ही खाएंगे।

यह लेख ईशा लहर अक्टूबर 2013 से उद्धृत है।

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