संपूर्णता और स्वास्थ्य

स्वस्थ और संपूर्ण
स्वस्थ और संपूर्ण

सद्‌गुरुक्या बाहरी उपकरणों के नतीजों और टेस्ट इत्यादि से आपको स्वस्थ बताया जाता सकता है? या फिर क्या कोई डॉक्टर चेक अप के द्वारा आपको स्वस्थ घोषित कर सकता है? या फिर स्वास्थ्य ऐसी चीज़ है जो इन सब मेडिकल प्रमाणों को तो अपने आप में शामिल करती है, लेकिन असल में उससे कहीं ज्यादा है…

आजकल लोगों ने ‘स्वास्थ्य’ को ‘अस्पताल’ से जोड़ना शुरू कर दिया है। मैं इस नजरिये को बदलना चाहता हूं। स्वास्थ्य का मतलब आपसे है, अस्पताल से नहीं। जब हम बीमारी की एक खास हालत में होते हैं, जो हमारे काबू के बाहर होती है, उस समय अस्पताल की जरूरत होती है।

योग का मकसद स्वास्थ्य नहीं है। स्वास्थ्य योग का एक साइड-इफेक्ट है, एक स्वाभाविक नतीजा है। जो योग की अवस्था में होता है, वह सिर्फ स्वस्थ ही नहीं, अपने अंदर संपूर्ण भी होता है।
लेकिन कोई अस्पताल हमें स्वास्थ्य नहीं दे सकता। स्वास्थ्य एक ऐसी चीज है जो हमें अपने भीतर से पैदा करनी होती है। अगर आप शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक रूप से अपने अंदर संपूर्ण महसूस करते हैं, तो आप स्वस्थ हैं।

चाहे आप मेडिकल की भाषा में स्वस्थ हों, लेकिन फिर भी हो सकता है कि आप असल में स्वस्थ न हों क्योंकि स्वास्थ्य एक ऐसा अनुभव है, जिसे इंसान अपने अंदर महसूस करता है। तो संपूर्णता की यह भावना कैसे पैदा की जाए? यकीनन यह कोई और हमें नहीं दे सकता। जब आपका शरीर, मन और इन दोनों को जोड़ने वाली ऊर्जा, यह सब तालमेल में होते हैं, तो आप स्वस्थ महसूस करते हैं।

चलिए पहले इस शरीर को समझते हैं कि वह कैसा है: जब आप पैदा हुए थे, तो आपका शरीर बहुत छोटा था। अब वह इतना बड़ा हो गया है। कैसे? आपके खाए हुए भोजन से। इसलिए, आपका शरीर बस भोजन का एक ढेर है, जिसे आपने इतने समय में इकट्ठा किया है। या आप उसे मिट्टी का एक टुकड़ा कह सकते हैं, जिसे आपने भोजन के रूप में अपने अंदर लिया। जब वह वापस धरती में गिरता है, तो फिर से मिट्टी हो जाता है।

डॉक्टर आपसे कहते हैं कि आप मनोदेह हैं, यानि आप मन और शरीर का एक मेल हैं। लोगों को मनोदैहिक बीमारियां होती हैं; मन की एक खास हालत की वजह से वे शरीर से भी बीमार हो जाते हैं। जिस तरह एक भौतिक या स्थूल शरीर होता है, उसी तरह एक मानसिक शरीर होता है। इसलिए मन के स्तर पर जो भी होता है, वह स्वाभाविक रूप से शारीरिक स्तर पर भी होता है और शरीर के स्तर पर जो होता है, वह मन पर भी असर डालता है। ये दोनों चीजें हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर की तरह हैं लेकिन हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर अपने आप कुछ नहीं कर सकते, जब तक कि आप उसे बिजली से न जोड़ें। तो इस बिजली यानी शरीर की तीसरी परत को ऊर्जा-देह या प्राणमयकोष कहा जाता है। योग में हम जो भी करते हैं, वह ज्यादातर आपके ऊर्जा देह के स्तर पर होता है।

अगर आपकी ऊर्जा देह पूरी तरह जीवंत और उचित संतुलन में है, तो शरीर में कोई बीमारी नहीं हो सकती। हमारे पास एक संपूर्ण योग अस्पताल है, जहां हम बिना किसी दवा के, सिर्फ योगाभ्यासों से लोगों का उपचार करते हैं। दमा के किसी मरीज को हम एक खास अभ्यास कराते हैं। दमा गायब हो जाता है। मधुमेह के मरीज को हम वही अभ्यास कराते हैं और मधुमेह खत्म हो जाता है। हृदयरोग से पीड़ित व्यक्ति को हम वही अभ्यास कराते हैं, वे अपने हृदयरोग से मुक्त हो जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम बीमारी का उपचार जैसा कुछ नहीं कर रहे। जिसे आप सृष्टि का स्रोत कहते हैं, वह हमारे भीतर भी काम करता है – वह इस पूरे शरीर का निर्माण करता है। जब वह आयाम आपके भीतर मौजूद है, तो अगर आप उसे अपने शरीर में आजादी से काम करने दें, तो क्या वह आपके हृदय या लिवर या किडनी या किसी भी बीमार अंग को ठीक नहीं कर सकता? बस आपको उसे काम करने की आजादी देनी है।

योग का विज्ञान और तकनीक आपके शरीर, मन और ऊर्जा को इस तरह से तैयार करने के बारे में है कि जो आयाम इस सारी सृष्टि का स्रोत है, वह ठीक से काम करने लगे। एक बार वह काम करने लगे, तो स्वास्थ्य अपने आप आ जाता है। योग का मकसद स्वास्थ्य नहीं है। स्वास्थ्य योग का एक साइड-इफेक्ट है, एक स्वाभाविक नतीजा है। जो योग की अवस्था में होता है, वह सिर्फ स्वस्थ ही नहीं, अपने अंदर संपूर्ण भी होता है।

एक इंसान संपूर्ण कब हो सकता है। फिलहाल, आप अपनी जिंदगी में जो भी काम करते हैं, कॅरियर या परिवार या और कुछ, आपको किस चीज की तलाश होती है? खुशी की तलाश। है न? अलग-अलग लोगों को लगता है कि अलग-अलग चीजें उनके लिए खुशी लाएंगी।

आजकल स्वास्थ्य का मतलब शरीर में हर तरह के रसायनों को डालते हुए उसे संतुलन में लाना है। यह तब जरूरी हो जाता है जब आपका स्वास्थ्य एक खास सीमा से नीचे गिर जाता है।
लोग मानते हैं कि बाहर से सब ठीक करते हुए, सब कुछ ठीक किया जा सकता है। आपके जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर नहीं है कि आप किस तरह के कपड़े पहनते हैं, किस तरह की कार चलाते हैं, किस तरह के घर में रहते हैं। इस पल आप कितने शांत और खुश हैं, यह आपके जीवन की गुणवत्ता है। हमने बाहरी चीजों पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया लेकिन हमने अंदरूनी चीजों की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं दिया। अगर हम अंतस की ओर ध्यान नहीं देते या हम भीतरी हिस्से को उस तरह तैयार नहीं करते, जिस तरह इसे होना चाहिए, तो मनुष्य की खुशहाली और स्वास्थ्य का कोई सवाल नहीं है। आपके अंदर कुछ ऐसी चीज है जो लगातार अपनी मौजूदा स्थिति से थोड़ा और ज्यादा होना चाहती है। अगर यह चाह पूरी नहीं होती, तो इंसान नहीं जान सकता कि असली स्वास्थ्य क्या है। इसके बिना वास्तविक स्वास्थ्य को जानने का कोई तरीका नहीं है।

आजकल स्वास्थ्य का मतलब शरीर में हर तरह के रसायनों को डालते हुए उसे संतुलन में लाना है। यह तब जरूरी हो जाता है जब आपका स्वास्थ्य एक खास सीमा से नीचे गिर जाता है। लेकिन आप गोलियां निगलते हुए स्वस्थ नहीं हो सकते। अगर आपको स्वास्थ्य चाहिए, तो आपको अपने भीतर काम करना होगा। तभी आप स्वस्थ हो पाएंगे। अगर आप अंदरूनी आयाम को काम करने दें, तो स्वस्थ होना बहुत आसान है। अपने शरीर, मन और ऊर्जा को तालमेल में लाना ताकि वह अंदरूनी आयाम के काम करने के लिए रास्ता बन सके – योग का विज्ञान यही है।

 

 


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  • Amit Dwivedi

    नसिह-ऐ सेहत

    मुस्किल बहुत है सेहत का बनाना ! बिगड़ जय तो फिर काया है ठिकाना !!

    सेहत के इन असुलो पर चलोगे ! तो ए दोस्त हमेशा फुलोगे फलोगे !!

    कई रोगो की जड़ होती है कब्ज जालिम ! नहीं रखना इससे जरा भी मरासिम !!

    अगर चाहो इस से पीछा छुड़ाना ! तो रोज किसमिस और गुलकंद खाना !!

    बहुत मीठे है फल जो रव ने बनाये ! इन्हे खाओ तो नूर चेहरे पर आए !!

    जो खाए दूध, घी और मट्ठा ! तो बुढ़पे तक भी बना रहे पाठ्ठा !!

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