5 टिप्स किशोरावस्था को बेहतर बनाने के

पांच सूत्र : किशोरावस्था को बेहतर बनाने के
पांच सूत्र : किशोरावस्था को बेहतर बनाने के

अगर आप भी एक किशोर बच्चे के माता या पिता हैं या आपका बच्चा किशोरावस्था की तरफ बढ़ रहा है, तो आप अगर सिर्फ पांच बातों का ख्याल रखें तो यह अवस्था न केवल आपके बच्चे के लिए बल्कि आपके लिए भी एक सुखद अहसास बन सकती है।

क्या किशोरावस्था समस्या है?

आपके जीवन में तमाम तरह की परिस्थितियां आती हैं। ध्यान रखें कि वो सिर्फ परिस्थितियां ही होती हैं। अब इनमें से कुछ को आप संभाल पाते हैं और कुछ को संभाल नहीं पाते। जिस स्थिति को आप संभाल नहीं पाते, उसे आप एक समस्या मानने लगते हैं, बजाय इसके कि आप उसे सिर्फ एक स्थिति के तौर पर देखते और उसे संभालने के लिए खुद को तैयार करने की कोशिश करते। तो कैसे करें खुद को तैयार? अगर आप भी एक किशोर बच्चे के माता या पिता हैं या आपका बच्चा किशोरावस्था की तरफ बढ़ रहा है तो आप सिर्फ पांच बातों का ख्याल रखें, यह अवस्था न केवल आपके बच्चे के लिए बल्कि आपके लिए भी सुखद अहसास बन सकती है।

1- उनके अच्छे दोस्त बनें

अगर आप एक किशोर की नजर से जिदंगी को देखें तो उनके भीतर जिंदगी रोज बदल रही है। चूंकि किशोर बहुते तेजी से बढ़ रहे हैं, इसलिए उनके आसपास के लोग उस वृद्धि को समझ पाने में सक्षम नहीं होते। आमतौर पर दादा-दादी या नाना-नानी इन बच्चों के प्रति ज्यादा लगाव और प्रेम रखते हैं। इसकी वजह है कि वे चीजों को एक थोड़ी दूरी के साथ देख रहे होते हैं। किशोरावस्था में आप धीरे-धीरे अपने हॉरमोन के वश में आ जाते हैं। जबकि बुढ़ापे का मतलब है कि आप हारमोन्स के नियंत्रण से बाहर निकलने लगते हैं। इसलिए बुजुर्ग लोग किशोरों की मानसिकता को थोड़ा समझ पाते हैं। लेकिन जो मध्य आयु के होते हैं, उनलोगों को किशोरों की मानसिकता के बारे में अधिक जानकारी नहीं होती। अगर ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखा जाए तो मध्य आयु हमेशा से एक भ्रमित मानसिकता का शिकार रही है।

 

किशोरावस्था के कई पहलू होते हैं। पहली चीज, उनकी प्रतिभा या बुद्धि हारमोनों द्वारा संचालित होने लगती है। अचानक उनको पूरी दुनिया काफ़ी अलग सी नजर आने लगती है। अभी तक उनके आसपास जो लोग होते हैं, वो अचानक उनको स्त्री और पुरुष के रूप में नजर आने लगते हैं, यानी लिंग-भेद के प्रति वो अधिक सचेत हो उठते हैं। और इस वजह से इंसान की सिर्फ आधी आबादी में उनका रुझान होने लगता है। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव है। माता-पिता को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि किशोरों के लिए यह स्थिति नई है और वो उससे तालमेल बैठाने की कोशिश कर रहे हैं।

अगर आप उनके अच्छे दोस्त हैं और उनको कोई समस्या आती है तो वे इसके बारे में आपसे बात करेंगे। लेकिन अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों के बहुत खराब दोस्त होते हैं, इसलिए वे बेचारे अपने लिए दूसरे दोस्त बनाते हैं। चूंकि उनके दोस्त भी उसी अवस्था और मानसिकता से गुजर रहे होते हैं, इसलिए वे उनको बेतुकी सलाह ही देते हैं। बेहतर स्थिति तो यह है कि अगर उन्हें कोई समस्या है तो वो आपके पास आएं, लेकिन अगर आप खुद को बॉस समझते हैं तो वे आपके पास नहीं आएंगे। अगर आपको लगता है कि उनके जीवन पर आपका मालिकाना हक है,या अगर आप एक भयंकर माता-पिता हैं तो वे आपके पास नहीं आएंगे।

अगर आप उनके अच्छे मित्र हैं तो वे आपके पास जरूर आएंगे, क्योंकि जब भी उन्हें कोई समस्या होगी तो वे स्वाभाविक रूप से एक दोस्त को तलाशेंगे। इसलिए आपकी पूरी कोशिश होनी चाहिए कि कम उम्र से ही आप उनके सबसे अच्छे दोस्त बनें, और कम से कम तब तक बने रहें जब तक वो 18 से 20 साल के न हो जाएं। दोस्ती का यह भरोसा आपको अर्जित करना होगा। यह महज इसलिए नहीं होगा, क्योंकि आपने उन्हें पैदा किया है। उन्हें पैदा करने के चलते आपको माता-पिता की उपाधि तो मिल गई है, लेकिन दोस्त की नहीं। इस चीज को हासिल करने के लिए आपको रोज जिम्मेदारी भरा व्यवहार करना होगा।

2- उन्हें जिम्मेदार बनाएं

आप अपने किशोरों के साथ निबटने की कोशिश न करें, बल्कि खुद को उनके लिए हमेशा उपलब्ध रखें। उन्हें हर चीज या काम के लिए जिम्मेदार बनाएं। कभी इतनी हिम्मत दिखाएं कि कम से कम एक महीने अपनी पूरी तनख्वाह उन्हें सौंप दें और उन्हें घर चलाने की जिम्मेदारी दे दें। आपको बड़े पैमाने पर बदलाव दिखेगा। अगर आप वाकई अपने बच्चे के साथ कुछ करना चाहते हैं तो आपको उन्हें अपने विस्तार का मौका देना चाहिए, क्योंकि यही तो वो भी करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस समय सिर्फ उनका शरीर ही बढ़ रहा है, बल्कि बतौर इंसान उनकी क्षमता भी बढ़ रही है। इसलिए उनके उस विस्तार को रोकने की बजाय आपकी कोशिश उस विस्तार को बढ़ावा देने की होनी चाहिए।

अगर आप इस विस्तार को रोकने की कोशिश करेंगे तो आपको बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ेगा। अगर आपको बेटा है तो आपकी समस्या एक तरह की होगी, लेकिन अगर आपकी बेटी है तो आपको दूसरी तरह की समस्या का सामना करना पड़ेगा। यह कभी मत सोचिए कि बच्चों को रोकना या काबू करना उनके जीवन को नियंत्रित करने का उचित तरीका है। जिम्मेदारी उन्हें रास्ते पर रखेगी। जैसा कि मैंने आपसे कहा कि आप एक महीना अपना पैसा उन्हें दें और उनसे कहें कि आप छुट्टी पर हैं और उन्हें घर चलाना है। अगर आपको डर है कि वह इस पैसे को बाहर जाकर कहीं उड़ा देंगे, तो चिंता मत कीजिए, जो दिक्कत आपको आएगी वही दिक्कत उनको भी आएगी। उन्हें भी कम से कम एक महीने के लिए इस हालात से गुजरने दीजिए। बेशक, आप अपने पास कुछ अलग से पैसा रख सकते हैं, लेकिन उन्हें भी अहसास होने दीजिए कि अगर आज उन्होंने सारा पैसा उड़ा दिया तो कल सुबह नाश्ता भी नहीं मिल पाएगा। इसलिए सडक़ पर या बाहर निकल कर बच्चे को हकीकत का अहसास कराने और सिखाने से बेहतर होगा कि उन्हें इसका अहसास घर के भीतर एक सुरक्षित माहौल में कराया जाए।

3- उनके असहायपन को बढ़ा चढ़ाकर न पेश करें

आपके बच्चे बड़े हो कर किशोर हो रहे हैं। यह मौका खुशी का है। लेकिन आप उनके बढऩे से परेशान हैं। दुर्भाग्य से हम शैशवास्था और बचपन का स्तुतिगान करते है, जबकि हकीकत में वो जीवन की असहाय अवस्थाएं हैं। जब बच्चे छोटे होते है, तो वो असहाय होते हैं और हर चीज के लिए आपकी तरफ देखते हैं। आपको बच्चे चमत्कारिक नजर आते हैं, क्योंकि वे असहाय होते हैं। मान लीजिए कोई बच्चा आपके सामने आकर आपसे कहे कि आप कौन होते है मुझे कुछ कहने वाले, तो हो सकता है कि आपको वह बच्चा अच्छा न लगे। लेकिन बच्चे यह सवाल करने में 14-15 साल लगा देते हैं।

बचपन जीवन का एक असहाय दौर होता है, जहां आप किसी दूसरे की मदद और सहयोग के बिना रह ही नहीं सकते। अगर आप बचपन का गुणगान करते रहेंगे तो आप जीवन भर असहाय बने रहेंगे। चूंकि लोग बच्चों के बचपन के इतने आदी हो चुके होते हैं कि जब यही बच्चे किशोरावस्था में पहुंचकर अपने पैर पर खड़े होना शुरू करते हैं तो उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगती।

अगर आप उस खिल रहे और ताजगी से भरे जीवन के लिए कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति बनना चाहते हैं तो आपको अपनी सीमा नहीं तय करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें तो हर वक्त अपने व्यक्तित्व की अहमियत का अहसास नहीं कराना चाहिए। जब बच्चा शिशु था और वह घुटनों के बल चलता था तो आप भी उसके साथ घुटने के बल चलते थे। अब वही बच्चा अगर किशोर बनकर झूलना चाहता है तो आपको भी उसके साथ झूलने के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन अब भी अगर आप उसके साथ घुटने के बल चलना चाहेंगे तो उसकी इसमें कोई रुचि नहीं होगी। जवानी और जोश से भरे हुए किशोरों को वैसे माता-पिता हास्यास्पद नजर आते हैं जो अब भी उनके साथ घुटने के बल चलने की इच्छा रखते हैं।

4- उन पर अधिकार मत जताइए, उन्हें शामिल कीजिए

सबसे पहले तो इस विचार को छोड़ दीजिए कि बच्चे के जीवन पर आपका अधिकार है। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो किशोरावस्था में आने के बाद वे आपको अपने तरीके से बताएंगे कि उनके जीवन पर आपका हक नहीं है। ये किशोर सिर्फ आपको इतना ही बताने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आप इनकी इस बात को हजम करने के लिए तैयार नहीं हैं। किसी दूसरे के जीवन पर आपका कोई हक नहीं है। अगर कोई दूसरा जीवन आपके साथ रहने का फैसला करता है तो खुशी मनाइए, यह अपने आप में एक शानदार चीज है। फिर चाहे वो आपके पति हों, पत्नी हो या बच्चे। इसकी अहमियत समझिए कि उन्होंने जीवन में आने के लिए आपको जरिए के रूप में चुना या जीवन जीने के लिए आपके साथ आने का फैसला किया। इसलिए आप किसी भी तरह से उन पर अधिकार नहीं जमा सकते। अगर आप अभी यह बात नहीं समझे तो आपको यह बात तब समझ में आएगी, जब आप मरेंगे या जब वे मरेंगे। आपका उन पर मालिकाना हक नहीं है, लेकिन बेशक आपको उन्हें अपनी जिंदगी में साथ लेकर और शामिल करके चलना चाहिए।

5- अपने लिए कुछ कीजिए

अगर हम वाकई अपने बच्चों का बेहतर पालन पोषण करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए कि हम अपने लिए क्या कर सकते हैं। जो लोग अभी माता-पिता बनना चाहते हैं या बनने वाले हैं, उन्हें एक छोटा सा प्रयोग करना चाहिए। उन्हें आराम से बैठ कर आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि क्या चीज उनकी जीवन में ठीक नहीं है और क्या उनके जीवन के लिए बेहतर होगा। इसमें उन चीजों पर गौर नहीं करना चाहिए, जो बाहरी दुनिया से संबंधित है, क्योंकि इसमें उन्हें बाहरी लोगों का सहयोग लेना पड़ेगा। उन्हें सिर्फ अपने से जुड़े पहलुओं पर गौर करना चाहिए। उन्हें देखना चाहिए कि क्या अगले तीन महीने में वे अपने में बदलाव ला पाते हैं।

अगले तीन महीने के भीतर अपनी किसी चीज पर मसलन – अपने व्यवहार, बोली, काम करने के तरीके या आदतों में आप सुधार ला पाते हैं तो आप अपने बेटे या बेटी को विवेकपूर्ण तरीके से संभालने के लिए तैयार हैं। अगर ऐसा नहीं है तो आपको दूसरों की सलाह और सुझाव से बच्चे पालने होंगे। हालांकि इस मामले में सलाह जैसी कोई चीज नहीं होती। इसमें हरेक बच्चे का अच्छी तरह से निरीक्षण औैर परख करके देखना होता है कि उस बच्चे के साथ क्या किया जा सकता है और क्या नहीं। आप एक जैसी चीज हर बच्चे के साथ नहीं कर सकते, क्योंकि हर बच्चे में एक अलग जीवन, एक अलग तरीके से घटित हो रहा है।

**अपने बच्चों की परवरिश के बारे में और पढ़ने के लिए नीचे दिए गए ब्लोग्स पर जाएं…
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***यह लेख ईशा लहर के मई अंक में प्रकाशित हुआ था। ईशा लहर डाउनलोड करने के लिए यहां जाएं


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