खाना जरूर खाइए, पर दिल से

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 “जिस हवा को आप सांस में लेते हैं, जो पानी आप पीते हैं, जिस जमीन पर आप चलते हैं, जो हरियाली आप निहारते हैं, जो फल और साग-सब्जियां आप खाते हैं, और अपने आसपास की सभी चीजों के साथ जब आप  दिल से पेश आते हैं , तो आपकी जिंदगी बड़ी खूबसूरत हो जाएगी।” – सद्‌गुरु

खाना जरूर खाइए, लेकिन सिर्फ उसका स्वाद लेते हुए नहीं, बल्कि भोजन से जो पोषण हमें मिलता है, उसका आनंद लेते हुए और हमारे जीवन के लिए जो उसका महत्व है, उसका आभार मानते हुए हमें खाना चाहिए। महज जीभ के सुख के लिए खाना खाना यह तय कर देता है कि यही खाना बहुत जल्दी हमें खाने को लौटेगा।

खाने का सच्चा आनंद तो इसमें है कि आप इसको लेकर जागरुक हैं कि एक अन्‍य जीवन आपका हिस्सा बनने को तैयार है, आपके जीवन में घुलमिल कर ‘आप’ बन जाने को राजी है।

मैं भोजन करने के आनंद को छीनने के लिए यह नहीं कह रहा हूं। खाने का सच्चा आनंद तो इसमें है कि आप इसको लेकर जागरुक हैं कि एक अन्‍य जीवन आपका हिस्सा बनने को तैयार है, आपके जीवन में घुल मिल कर ‘आप’ बन जाने को राजी है। यह सबसे बड़ी खुशी है कि कोई चीज जो आपका हिस्सा नहीं है, वह किसी प्रकार से आपका हिस्सा बनने को तैयार है। इसी को हम प्रेम कहते हैं। इसी को लोग भक्ति कहते हैं। यही तो आध्यात्मिक प्रक्रिया का परम लक्ष्य है।

यह वासना, जुनून, प्रेम, भक्ति या आत्‍मज्ञान, सब एक ही हैं, बस पैमाने का फर्क है। अगर यह दो लोगों के बीच होता है, तो हम इसको इश्क कहते हैं। अगर यह एक बड़े समूह के साथ होता है, तो हम इसको प्रेम कहते हैं। अगर यह बिना भेद-भाव सबके साथ होता है, तो इसको करूणा कहते हैं। अगर यह बिना किसी रूप-आकार के निराकार के साथ होता है, तो इसको भक्ति कहते हैं। अगर यह सबसे ऊंचे पैमाने पर होता है, तो इसको आत्‍मज्ञान कहते हैं।

भोजन और उसे खाना- ये अस्तित्व की एकरूपता को दिखाते हैं। हर दिन आपके खाने के वक्त यह खूबसूरत प्रक्रिया होती है। कोई- जो कभी पौधा था, जो कभी बीज था, जो कभी कोई प्राणी था, एक मछली, या एक पक्षी था, उसका इंसान में घुलमिल कर इंसान बन जाना अस्तित्व की एकरूपता को साफ तौर पर दिखाता है और यह भी दिखाता है कि हर चीज में सृष्टा का हाथ है।


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