कैसे बचें फ़िज़ूल की प्रतिक्रिया से?

Unecessary Reaction

सद्गुरुकभी-कभी जब हमारे सामने कोई मुश्किल परिस्थिति आती है तो हम शांत रहने की बजाए गुस्से में आकर प्रतिक्रिया दे बैठते हैं। कैसे कम कर सकते हैं अपनी क्रोधपूर्ण प्रतिक्रियाओं को?

सद्‌गुरु :

बेहतर है कि आप अपनी बुद्धि से काम लें, सिर्फ प्रतिक्रिया न करें। बुद्धि से काम लेने के लिए सबसे पहले आपको चीजों को उसी रूप में देखना होगा, जैसी वे वाकई हैं, उन्हें किसी पहचान से जुड़कर कर देखना छोड़ना होगा।
प्रेम-करुणा और क्रोध-नफरत की शक्तियां इस दुनिया में हमेशा सक्रिय होती हैं। यह एक दो सिरे वाले झूले के खेल की तरह है। सवाल यह है कि आप इस झूले के किस सिरे पर होना चाहते हैं। अगर हम वाकई एक भयावह स्थिति की कगार पर हैं, तो यह और भी अहम है कि आध्यात्मिक प्रक्रिया को ज्यादा जोरशोर से लागू किया जाए, क्योंकि आखिरकार यही एक चीज है जो लोगों में मानसिक संतुलन ला सकती है।

कृपया ध्यान दीजिए कि जिस पल आप ऐसी चीजों में यकीन करना शुरू करते हैं, जो आपके लिए एक जीवंत अनुभव नहीं होती हैं, तो आप कुदरती तौर पर द्वंद में होते हैं। आज आप एक शांतिपूर्ण इंसान हैं लेकिन कल जब कोई वाकई आपके विश्वास का विरोध करेगा, तो आप खड़े होकर लड़ेंगे।

किसी विश्वास की ओर जाने में क्या समझदारी है? विश्वास की ओर जाने के क्या फायदे हैं? बस यह कि आपका अहं आरामदेह और संतुष्ट महसूस करता है। ‘मैं नहीं जानता’ अहं को बहुत चोट पहुंचाता है। ‘मैं जानता हूं’ से ही आप अपने अहं को बढ़ा सकते हैं। किसी भी हालात में, जब आप कहते हैं ‘मैं नहीं जानता’, तो आप किसी से नहीं लड़ सकते, आप किसी से टकराव नहीं कर सकते। आप बहुत विनम्र और बढ़िया इंसान होते हैं।

अपने अंदर शांति लाने के काबिल बने बिना आप दुनिया में शांति नहीं ला सकते। अगर आप इस छोटे से दिमाग को शांतिपूर्ण नहीं बना सकते, तो क्या आप दुनिया को शांतिमय बना सकते हैं? दुनिया में आपको जो दिखाई दे रहा है, वह बस आपके छोटे से दिमाग का ही एक विस्तार है, आपके दिमाग का एक बड़ा रूप है। क्या दुनिया में कुछ ऐसा घटित हो रहा है, जो आपके दिमाग में नहीं हो रहा? वह आपके दिमाग में भी घटित हो रहा है।

योग का विज्ञान अपने अंदर देखने का एक तरीका है। अंदर देखने का मतलब किसी भी नजरिये या सिद्धांत से देखने से नहीं है – आपको बस अपने अंदर देखना है। अगर आपकी पहचान किसी चीज से जुड़ी है, तो आप अपने अंदर नहीं देख सकते। जिस पल आपकी पहचान जुड़ती है, आपके लिए सभी दरवाजे बंद हो जाते हैं। आप किस तरह सोचते और महसूस करते हैं, वह इस पर निर्भर करता है कि अभी आपकी पहचान किस चीज से है।

जब किसी चीज से आपकी पहचान जुड़ी होती है, तो आप बस एक प्रतिक्रिया बनकर रह जाते हैं।आपके पास किसी और तरीके से सोचने का विकल्प नहीं होता।आपके अंदर दूसरे इंसान के नजरिये को देखने की काबिलियत नहीं होती।
जैसे मान लेते हैं कि आप अपने आप को एक भारतीय के रूप में देखते हैं। अब अगर कोई परिस्थिति आती है, तो आप एक खास तरीके से उसे महसूस करते हैं और प्रतिक्रिया देते हैं। उस पल राष्ट्रीय हित में वह चीज सही हो सकती है, मगर प्रतिक्रिया करने की बजाय आप अधिक समझदारी से हालात का सामना कर सकते हैं। जब किसी चीज से आपकी पहचान जुड़ी होती है, तो आप बस एक प्रतिक्रिया बन कर रह जाते हैं। आपके पास किसी और तरीके से सोचने का विकल्प नहीं होता। आपके अंदर दूसरे इंसान के नजरिये को देखने की काबिलियत नहीं होती। आपके अंदर यह देखने की काबिलियत नहीं होती कि समस्या कहां से उपज रही है। आप बस प्रतिक्रिया करेंगे।

बेहतर है कि आप अपनी बुद्धि से काम लें, सिर्फ प्रतिक्रिया न करें। बुद्धि से काम लेने के लिए सबसे पहले आपको चीजों को उसी रूप में देखना होगा, जैसी वे वाकई हैं, उन्हें किसी पहचान से जुड़कर कर देखना छोड़ना होगा। जिस पल आप किसी चीज पर किसी पहचान से जुड़कर नजर डालते हैं, आप उसके प्रति पक्षपाती हो जाते हैं।

ध्यान अपनी पहचान छोड़ने और असली शांति का अनुभव करने में आपकी मदद करने का एक तरीका है। कम से कम जब आप बैठकर ध्यान करते हैं, तो किसी और चीज का अस्तित्व नहीं होता। बस जीव होता है, कुछ और नहीं।

शांति का मतलब है, शून्यता। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जो आप बनाते हैं, यह कोई ऐसी चीज नहीं है, जो घटित होती है। शांति एक ऐसी चीज है, जो हमेशा मौजूद होती है। सतह पर जो होता है, वह अशांति होती है। यह बिल्कुल समुद्र की तरह है। समुद्र की सतह पर अशांति होती है, मगर गहराई में समुद्र पूरी तरह शांत होता है। जब आप ऐसे गुण के तालमेल में होते हैं, तभी आप असली शांति को जान पाते हैं।


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