चम्मच से नहीं, हाथ से खाना खाएं

भोजन : क्या खाएं और कैसे खाएं?
भोजन : क्या खाएं और कैसे खाएं?

सद्‌गुरुसमय के साथ हमारे भोजन का रूप तो बदला ही है, साथ ही बदला है हमारे भोजन करने का तरीका। अमेरिकी फिजिशियन मार्क हाइमन ने सद्‌गुरु से बातचीत की जिसमें इसी पक्ष के ऊपर चर्चा की गई। तो फिर कैसे करें भोजन?

सद्‌गुरु: आप अपनी जेब में कांटे के रूप में यह जो शानदार उपकरण लेकर घूमते हैं, वह भी एक तरह का अपराध ही है। अगर आप भोजन का स्पर्श नहीं करेंगे तो आपको पता ही नहीं चलेगा कि वह है क्या? अगर भोजन स्पर्श करने योग्य भी नहीं है तो मुझे समझ में नहीं आता कि फिर यह खाने योग्य कैसे हो सकता है?

मार्क हाइमनः तो इसका मतलब है कि हमें अपनी मां की बातों को नहीं सुनना चाहिए था। हमें खाना खाते वक्त अपने हाथों व उंगलियों का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि भोजन का स्पर्श करने से हम भोजन से जुड़े हुए रहते हैं।

भोजन के लिए हाथों का इस्तेमाल

सद्‌गुरु: आपके हाथों की सफाई पूरी तरह से आपके हाथ में है। हो सकता है कि कांटे की सफाई आपके हाथ में न हो। आपके हाथों का इस्तेमाल आपके अलावा किसी और ने नहीं किया, इसलिए आपके अलावा किसी दूसरे को नहीं पता होगा कि वह कितने साफ या गंदे हैं? जबकि कांटे को लेकर आपको पता नहीं होता कि किसने इसे छुआ था, किसने इसका इस्तेमाल किया, कैसे और किस काम के लिए इस्तेमाल किया।

लोग कहते हैं कि मीठा व कार्बोहाइड्रेट अपने आप में गंभीर मुद्दा है। लेकिन मेरे हिसाब से सबसे बड़ी व दीर्घकालीन चुनौती है – लोगों को मांसाहार से दूर रखना।
आम तौर पर इसे टिश्यू पेपर से पोंछ दिया जाता है और यह साफ लगने लगता है। सबसे बड़ी बात है कि जब आप खाते समय कांटे का इस्तेमाल करते हैं तो आप भोजन के स्पर्श का अनुभव नहीं कर पाते।

हम लोगों को खाने के बारे में जो चीज सबसे पहले सिखाई गई थी, वह थी कि अगर आपके सामने खाना आए तो सबसे पहले आप भोजन पर कुछ पल हाथ रखकर महसूस करें कि खाना कैसा है। अगर मेरी थाली में कोई खाने की चीज आती है तो मैं उसे चखेे बिना सिर्फ महसूस करके ही समझ जाता हूं कि क्या खाना चाहिए और क्या नहीं खाना चाहिए। सबसे पहले मेरे हाथ जान जाते हैं कि भोजन कैसा है। इसी तरह से अगर आप किसी इंसान को समझना चाहते हैं तो आप लोग एक दूसरे से हाथ मिलाते हैं, लेकिन मैं आमतौर पर ऐसा करने से बचता हूं।

मार्क हाइमनः यह अपने आप में एक अच्छी रणनीति है।

सद्‌गुरु: लेकिन खाने से पहले उस भोजन को जानना जरूरी है, जो आपके शरीर का हिस्सा बनने जा रहा है। अगर आप भौतिक रूप से हाथ से इसका स्पर्श नहीं भी करते, फिर भी आप सचेत हो कर साफ तौर पर जान सकते हैं कि सामने आया भोजन कैसा है और इसका आपके शरीर पर कैसा असर होगा? कोई भी भोजन आपके भीतर जाना चाहिए या नहीं, इसका निर्णय बदलता रहता है। इसकी वजह है कि आपका शरीर हर रोज, हर पल बदल रहा है। अगर आप भोजन को महसूस कर सकें तो आपको तुरंत पता चल जाता है कि इस भोजन को आज आपके भीतर जाना चाहिए या नहीं। अगर लोगों में इतनी जागरूकता आए जाए तो फिर हमें यह नहीं बताना होगा कि लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं? हर भोजन के समय वे यह तय कर सकते हैं कि उन्हें इस समय क्या खाना चाहिए।

ऐसा कोई एक तरीका या सूची नहीं है, कि आपको बताया जा सके कि आपको पूरा जीवन क्या खाना चाहिए। लोग कहते हैं कि मीठा व कार्बोहाइड्रेट अपने आप में गंभीर मुद्दा है। लेकिन मेरे हिसाब से सबसे बड़ी व दीर्घकालीन चुनौती है – लोगों को मांसाहार से दूर रखना। अमेरिका में लगभग दो सौ पौंड मांस प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति खाया जाता है। जबकि अमेरिका में हर साल 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होते हैं। दुनिया में महज चार ही देश ऐसे हैं, जिनकी सकल घरेलु उत्पाद यानी जीडीपी मुश्किल से इस राशि से ज्यादा होगी। दूसरे शब्दों में कहें, तो अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा का बिल दुनिया के ज्यादातर देशों की जीडीपी से ज्यादा है।

बीमारी क्रूरता है – खुद के साथ

यह जीवन जीने का एक बेहद क्रूर तरीका है और यह आपके शरीर की प्रणाली पर भी गलत असर डालता है। बीमारी पहले स्तर की क्रूरता है। अगर आप बीमार हैं तो आप शांत नहीं हो सकते, क्योंकि उस स्थिति में शरीर के स्तर पर लगातार आपका संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष किसी वाइरस, बैक्टिरिया या शरीर में आने वाली किसी भी बाहरी चीज से हो सकता है। जबकि पुरानी बीमारी एक गृहयुद्ध की तरह है। इसमें आप बिना किसी बाहरी दुश्मन के अपने शरीर के भीतर ही एक जंग छेड़ लेते हैं।

दुनिया में बहुत से लोग पुरानी और गंभीर बीमारियों से मरते हैं और सबसे बड़ी बात कि जब वह जिंदा भी होते हैं तो ठीक से नहीं जी पाते। अफसोस की बात है कि ऐसे रोगियों की तादाद सबसे ज्यादा एक ऐसे देश में है, जो दुनिया के सबसे संपन्न और समृद्ध देशों में से एक है।

अमेरिका में हर साल 3 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होते हैं। दुनिया में महज चार ही देश ऐसे हैं, जिनकी सकल घरेलु उत्पाद यानी जीडीपी मुश्किल से इस राशि से ज्यादा होगी।
इसका मतलब है कि जब हमारे पास संपन्नता आती है तो हम अपनी समझ खो देते हैं। अमेरिका दुनिया के सामने यही उदाहरण पेश कर रहा है। यह चीज कभी न कभी पूरी दुनिया में होगी। ऐसी ही हालत हमें भारतीय शहरों में भी दिखाई दे रही है। बात सिर्फ इतनी है कि इस समय अमेरिका सबसे आगे है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि इस मामले में अमेरिका खुद को सुधार ले क्योंकि जो कुछ भी अमेरिका करता है, किसी न किसी वजह से पूरी दुनिया उसका अनुसरण करती है।

आपको भारतीय शहरों में तकरीबन साठ फीसदी लोग जींस पहने दिख जाएंगे। अगर आप गांवों में जाएं तो हो सकता है कि वहां के लोगों ने योग के बारे में न सुना हो, लेकिन कोका कोला के बारे में वो जरुर जानते होंगे। अगर किसी देश का दूसरे देशों पर इतना असर हो रहा है तो उस देश की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है। आप पर न केवल अपने देश की सेहत ठीक रखने की जिम्मेदारी है, बल्कि आप पर पूरी दुनिया की सेहत का ख्याल रखने की भी जिम्मेदारी है, क्योंकि पूरी दुनिया आपके किए हर काम का अनुकरण कर रही है।

मार्क हाइमन: दरअसल, भारत और चीन में डाइबिटिक रोगियों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है। दुनिया के 80 फीसदी डाइबिटिक रोगियों की तादाद विकासशील देशों में है। इसकी वजह है कि हमने दुनिया में सबसे बेकार आहार तैयार किया है, जिसे तमाम देशों को निर्यात कर रहे हैं और लोग इसे खा रहे हैं। अमेरिका में हर तीन वयस्कों में एक प्री-डाइबिटिक है या टाइप-2 डाइबिटिक है। जबकि मैक्सिको में हर दस बच्चे में एक बच्चा टाइप-2 डाइबिटिक है, जिसे हम बड़ों को होने वाली डायबिटीज की शुरुआत कह सकते हैं।

यह महामारी नियंत्रण से बाहर हो रही है। जो सोडा हम पीते हैं, जो ‘प्रोसेस्ड फूड’ हम खाते हैं और जो भ्रामक जानकारियां लोगों तक पहुंचती है, ये सब मिलकर इसे और गंभीर बनाती हैं। पिछले कुछ सालों से मुझे जो एक चीज खटक रही है, वो यह कि लोग सही चीज करना तो चाहते हैं, लेकिन अकसर उन्हें इसके बारे में सही जानकारी नहीं होती।

भोजन अपने आप में औषधि बन सकता है

यहां मैं अमेरिकी फिल्म ‘फेड अप’ का जिक्र करना चाहूंगा। उस फिल्म की कहानी बच्चों में होने वाले मोटापे और वहां के ‘फूड इंडस्ट्री’ पर थी। मोटापा तो अमेरिका में एक महामारी की तरह फैल रहा है। मैं एक ऐसे परिवार को जानता हूं जो दक्षिण कैरोलिना में रहता है और जो मोटापे और अत्यधिक वजन से ग्रस्त है। यह परिवार बीमार भी रहता है। इस परिवार में पिता डायलिसिस पर थे, मां तकरीबन 150 पाउंड ओवरवेट थी और उसे भी कई बीमारियां थीं। उनका सोलह साल का बेटा था, जो डाइबिटिक था और उसका वजन भी औसत से साठ-सत्तर पाउंड ज्यादा था। वे लोग एक ट्रेलर में रहते थे और अपंगों को मिलने वाली सुविधाओं पर ही जीवित थे।

उनका सिर्फ एक ही इलाज था – भोजन। दवाओं से उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला था। तब मैंने उन्हें बताया कि कैसे सादा खाना तैयार किया जा सकता है। मेरे साथ एक व्यक्ति था जो ‘गुड फूड ऑन ए टाइट बजट’ (यानी कम पैसों में अच्छा भोजन) जैसी संस्था से था। यह संस्था पर्यावरण के लिए काम करने वाले लोगों के एक समूह की एक पहल के रूप में सामने आई थी।

यह बेहद जरूरी है कि इस मामले में अमेरिका खुद को सुधार ले क्योंकि जो कुछ भी अमेरिका करता है, किसी न किसी वजह से पूरी दुनिया उसका अनुसरण करती है।
यह समूह सिखाता था कि कैसे अच्छा भोजन किया जाए, जो न सिर्फ आपके लिए, इस धरती और पर्यावरण के लिए, बल्कि आपकी जेब के लिए भी अच्छा हो। हालांकि इस परिवार को यह भी नहीं पता था कि खाना कैसे बनाया जाता है। मैंने उनको सिखाया कि कैसे बिना प्रोसेस्ड फूड व चीनी के भी आप खाना बना सकते हैं। इतना ही नहीं, मैंने मदद के लिए उन्हें अपनी किताब भी दे दी।

खाना बनाने की आदत के चलते मां के वजन में जहां सौ पाउंड की कमी आई, वहीं पिता का वजन भी पैंतालिस पाउंड कम हुआ। उन्हें नई किडनी मिल गई। बेटे के वजन में भी पचास पाउंड की कमी आई। यहां लोगों में सही चीज करने की भूख तो है, लेकिन दिक्कत यह है कि उन्हें सही जानकारी नहीं मिलती।

मुझे लगता है कि खाद्य उद्योग के कुछ तत्वों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह जानबूझ कर की जा रही कोशिश है, जिससे कि हमें हमारे पारंपरिक भोजन से दूर किया जा सके। जैसा कि सद्गुरु ने कहा कि सही भोजन से मतलब है कि हम उससे जुड़ें, उससे ज्यादा से ज्यादा सपंर्क बढ़ाएं, असली भोजन करें और जो हम खाने जा रहे हैं, उस आहार के बारे में जानें कि वह वास्तव में है क्या।

मुझे लगता है कि यह क्रांति होकर रहेगी। इतना ही नहीं, यह वो बीज है, जिससे जब पौधा निकलेगा तो यह मानव जाति से जुड़ी तमाम ग्लोबल समस्याओं का हल निकालेगा। विश्व आर्थिक मंच यानी ‘वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम’ कहता है कि दुनिया के आर्थिक विकास के लिए एक सबसे बड़ी चुनौती है -गंभीर व पुरानी बीमारियों का विक्राल रूप लेना। यह विक्राल समस्या सीधे तौर पर जुड़ी है, हमारे भोजन से। हम अपने खान-पान और जीवन-शैली में बदलाव करके इस विकराल समस्या से निजात पा सकते हैं।

जरुरत से ज्यादा वजन ढोना एक पीड़ा है

सद्‌गुरु: गलत तरीके से खाना और गलत मात्रा में खाना, भोजन से जुड़े दो अलग लेकिन अहम पहलू हैं। जिस तरह से लोग खाना खाते हैं, वह क्रूरता है और अगर हम इस शरीर का वजन जरुरत से ज्यादा रखते हैं तो यह एक तरह से धरती का क्षरण है। आप अपने शरीर से जितनी भी अतिरिक्त चर्बी घटाते हैं, वह बाहर निकल कर आकाश में तो जाती नहीं, वह सब वापस इसी धरती में मिलती है। आप वजन पर काबू करके धरती के क्षरण को रोक सकते हैं!

हालांकि हम अपनी इच्छानुसार वजन ढो सकते हैं, लेकिन हमें उस सीमा से ज्यादा नहीं ढोना चाहिए, जहां हम इसे संभाल नहीं पाएं या जो हमारे लिए सुविधाजनक नहीं हो। जरूरत से ज्यादा वजनदार होना भी अपने आप में एक समस्या और पीडा़ है और जो लोग इस स्थिति में होते हैं, वे अपने हल्के होने, फुर्तीले होने और जीवंत होने का अहसास और मतलब दोनों ही खो चुके होते हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा कि यह सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा नहीं है, न ही सिर्फ इससे मतलब है कि कितने लोग मरते हैं, बल्कि सबसे बड़ी समस्या है कि जितने लोग जिंदा हैं, वे भी अपने जीवन को पूरी तरह से नहीं जी सकते।

मार्क हाइमन: यह बिल्कुल सच है। मसला सिर्फ यह नहीं है कि लोग बीमारियों से बचे रहें। लोग जो खाना खाते हैं और वे जैसा महसूस करते हैं, इन दोनों बातों को जोड़ ही नहीं पाते। यह सच है कि थोड़े से वक्त में ही आप अपने खाने के तरीके को बदलकर वाकई अपनी सेहत में बड़े बदलाव ला सकते हैं। हमने कई बार इस चीज को देखा है, यहां तक कि सिर्फ हफ्ते -दस दिन तक अपने भोजन के तरीके में बदलाव लाने से लोगों में खासा बदलाव दिखा है।

 


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