महाशिवरात्रि – ईश्वरीय कृपा और अनुकंपा से सराबोर रात

mahashivaratri 2013

आज ईशा फाउन्डेशन आनंद और उत्सव भरा पूरी रात चलने वाला महाशिवरात्रि महोत्सव मना रहा है। इसका आयोजन वेलियांगिरी पहाड़ियों की तराई में स्थित ईशा योग केन्द्र में  किया जा रहा है।

इस महोत्सव में भाग लेने और सद्‌गुरु का सानिध्य पाने के लिए दुनिया के हर कोने से करीब 8 लाख लोग योग केन्द्र पहुंच रहे हैं। इस कार्यक्रम में सद्‌गुरु के प्रवचनों और शक्तिशाली ध्यान प्रक्रियों के साथ-साथ दुनिया के कुछ मशहूर कलाकारों के नृत्य और संगीत की बहार भी देखने को मिलेगी। रघु दीक्षित और उनका  फोक-रॉक बैंड ‘द रघु दीक्षित प्रॉजेक्ट’, शास्त्रीय और आधुनिक नृत्यांगना अनीता रत्नम और विख्यात कर्णाटक गायिका पद्दमश्री अरुणा साइराम अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी पेश करेंगे। बीच-बीच में आप देखेंगे ईशा की संगीत मंडली ‘साउन्ड्स ऑफ ईशा’ की झूमाने व थिरकाने वाली संगीत का जादू।

यह प्रसारण हिंदी आस्था चैनल, तमिल जया प्लस, पॉलिमर टी वी और तेलगू भक्ति टीवी  के जरिए दुनिया भर में 3 करोड़ लोगों तक पहुंचेगा। ईशा फाउन्डेशन इस महोत्सव का लाइव वेबकास्ट भी करेगा जिसे आप mahashivaratri.org पर देख सकते हैं। इसके अलावा, भारत और दुनिया भर में अन्य 70 केन्द्रों में भी यह उत्सव रात भर पूरे उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

आईये इस ब्लाग पर आप सारी रात चलने वाले महोत्सव के सीधे प्रसारण का आनंद लें । शाम 6 बजे से सुबह 6 बजे तक।

05.50

दुनिया के हर इंसान को आध्यात्मिकता की एक बूंद भेंट करने की कोशिश में सद्‌गुरु निरंतर लगे हुए हैं। भले ही लोगों को अपनी कुशलता की परवाह हो न हो पर वे हर पल यह देखते हैं कि इंसान एक भव्य संभावना से चूक रहा है जिसके लिय वह समर्थ है।

महाशिवरत्रि महोत्सव और ऐसे कई उत्सव जो ईशा में मनाए जाते हैं उनकी इसी बेवाक करुणा का परिणाम है। महाशिवरात्रि की महिमा और महात्मय को हम पहले ही बता चुके हैं पर जानकारी के बावजूद लोग अपनी सुध को हर वक्त बनाये नहीं रख पाते और अपनी आदतों की चपेट में आ ही जाते हैं।

सद्‌गुरु ने आज इसका पूरा खयाल रखा कि पंडाल में मौजूद साधक और टीवी पर सीधा प्रसारण देख रहे दर्शक अपनी नींद के प्रलोभन में आकर कहीं इस संभावना से चूक न जाएं।

बाहर से आए लगभग सभी कलाकारों की पेशकशी के दौरान उन्होंने लोगों को उकसा कर रखा और प्रस्तुतियों के बीच बीच में उपस्थित साधकों के पास जा जा कर न सिर्फ नृत्य किया बल्कि उन्हें नचाया भी। इस तरह से पूरी रात लगभग सभी लोग जगे रहे और सद्‌गुरु के सानिध्य में ईश्‍वरीय कृपा और अनुकंपा से सराबोर इस रात का भरपूर फायदा उठाया। निःसंदेह मानवीय चेतना को जागृत करने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है।

05.47

जैसे जैसे रात ढलती जा रहीं है लोगों को जगाये रखना इस महोत्सव का एक महत्वपूर्ण पहलू है। रधु दीक्षित बैंड पार्टी के प्रदर्शन के बाद कई दूसरे संगीतकारो ने अपने प्रस्तुतियां दी।
महेश विनायकम की मंडली साउंड्स ऑफ ईश के साथ लगभग आधे धंटे तक पूरे पंडाल को पैर पर खड़ा रखा।

महेश विनायकम
उसके बाद बालभास्कर ने अपनी मंडली के साथ वायलिन बजाकर एक बेहतरीन प्रदर्शन दिया।
हर बार की तरह इस बार भी साउंड्स ऑफ ईशा की थिरकाने और झूमाने वाली बीट पर कार्यक्रम की समाप्ति हुई। सभी लोगों को एक अनजानी शक्ति ने न सिर्फ जगा कर रखा बल्कि उनको भरपूर उर्जा में सराबोर कर दिया। लोग चेहरे पर आनंद बिखेरे अब अपने घर को लौट रहे हैं।

बालभास्कर

 

 

04.57

ईश्वरीय कृपा पाने को आतुर
नागरकोयल से छह शिवांगा साधक 430 किलामीटर चलकर ईशा योग केन्द्र पहुंचे। अपनी यह अनोखी पदयात्रा उन्होंने 27 फरवरी को गुरू पूजा के साथ सुबह के चार बजे शुरू की।

उन्होंने हमें अपना यात्रा के दौरान हुआ अनुभव बताया-
‘मेरे पास इस अनुभव को बताने कि लिए कोई शब्द ही नहीं हैं। बस यही कह सकता हूं कि जैसे खुद भगवान शिव हमारे साथ हों। इस साधना के दौरान हमारा अहंकार तहस-नहस हुआ है और जिंदगी जीने के तौर तरीकों में काफी बदलाव आया है। पूरी यात्रा के दौरान हमें ईषा स्वयं सेवियों का भरपूर प्रेम और स्नेह मिला। यात्रा का अनुभव हमारे लिए बहुत हैरान कर देने वाला रहा और हमें लगता है कि ऐसा सौभाग्य और आशीर्वाद किसी इंसान को कई जन्मों के बाद ही मिलता है

विदेशी शिवांग साधक का अनुभव

एक विदेशी शिवांग ने भिक्षाटन के वक्त का अपना अनुभव बताया।
’जब मैं कोयम्बटूर कि गलियों में भीख मांग रहा था, तो मुझे एक टैक्सी ड्राइवर ने पूछा कि मैं ऐसा क्यों कर रहा हूं? मेरे लाख समझाने पर भी कि यह मेरी साधना का एक हिस्सा है, वह अपने देश में किसी अतिथि के इस तरह भीख मांगने को राजी नहीं हुआ।
उसने मुझे एक तरफ ले जाकर चाय और खाना देना चाहा। मुझे भूख नहीं थी। फिर उसने मुझे एक वैन में बैठने को कहा और खुद जाकर वहां की टैक्सी यूनिसन के बारह से भी ज्यादा टैक्सी ड्राइवरों से पैसे इकट्ठे करके ले आया। उसने अपने बैग में से मुझे एक नई कमीज भी देनी चाही जिसे मैंने लेने से मना कर दिया।
इस टैक्सी ड्राइवर ने मुझे खाना देना चाहा, पैसे दिए और कपड़े भी! उसके ऐसा करने से मैं पूरी तरह नम्र हो गया और यह बात मुझे इतना छू गई कि सहज ही मेरी आंखों में आंसू आ गए। मेरे लिए यह बहुत भावनात्मक अनुभव रहा।’

शिवांगा भेंट चढ़ाते हुए 

 

04.31

शिवांग साधना
यह प्रक्रिया जिसे हम ‘शिवांग’ कह रहे हैं, इसका मतलब है शिव का अंग होना। यह सिर्फ रचना के हिस्सा बने रहने से खुद रचयिता का अंग होने तक की एक पावन यात्रा है। हालांकि सृष्टि का स्रोत सब जीव-जंतुओं में है, मगर सिर्फ इंसानी जिन्दगी में ही ऐसी संभावना है कि उसे इसका अहसास हो सकता है। सिर्फ इंसान ही इसे एक जागरूक प्रक्रिया बनाने में समर्थ है। अगर आप अपने मन में भक्ति का दीप जला लें, तो फिर आप यहां पृथ्वी का हिस्सा बनकर नहीं, बल्कि खुद शिव का हिस्सा बनकर जिएंगे!

यह साधना केवल पुरुषों के लिये है। इसकी शुरूआत हुई 27 जनवरी धन्य पूर्णिमा को और आज 10 मार्च महाशि‍वरात्रि को इसकी पूर्णाहुति होगी। दुनिया के हर कोने से 6000 शि‍वांगा साधक ईशा योग केंद्र पहुंचे हैं। इस साधना के कई पहलू हैं। पहला, शरीर से संबंधित प्रक्रिया जिसे ‘शिव नमस्कार’ कहते हैं और दूसरा आपको कम-से-कम 21 लोगों से भिक्षा मांगनी होगी। जब वे आपको कुछ दें, तो आप यह न देखें कि उन्होंने क्या दिया। आपका अभिमान, आपका अहंकार, आपका व्यक्तित्व – यह सब किनारे रखकर भीख मांगना और वह भी बिना अपनी कमीज के! इस साधना से आपको बहुत फर्क पड़ेगा। आपके आसपास चाहे जो भी हो रहा हो, आपका शरीर शांत हो जाएगा।

अपनी ही मानसिकता में उलझे इंसान सिर्फ भटक सकते हैं। और ऐसे में अगर उसका मानसिक विकास होता है, तो यह एक बीमारी की तरह होगा। लेकिन अगर एक जीव का वाकई विकास होता है, तो यह कभी न रूकने वाली प्रक्रिया उसे और सुंदर बना देती है। इसी प्रक्रिया को और जल्दी कराने के लिए यह साधना है।
यह ईश्वरीय कृपा पाने के लिए सहायक है और इसीलिए उत्तरायण में की जाने वाली इस साधना का बहुत ज्यादा आध्यात्मिक महत्व है।
कल 11 मार्च को सभी शिवांगा साधक वेलिंयगिरि पर्वत की सातवीं पहाड़ी की चढ़ाई करेंगे। यह पहाड़ी दक्षिण के कैलाश के नाम से जानी जाती है जहां कृपा ही कृपा है।

और जानकारी के लिए सम्पर्क करें: 83000 15111 या info@dhyanalinga.org

03.50

रघु दीक्षित
11 नवम्बर 1974 एक पारम्परिक दक्षिण भारतीय परिवार में जन्मे रघु दीक्षित माईक्रोबायोलॉजी में स्वर्ण पदक विजेता और भरतनाटझ्यम के निपुण कलाकार हैं। जहां तक गिटार बजाने का सवाल है, तो यह उन्होंने 19 साल की उम्र में अपने कॉलेज के दोस्त से लगी एक शर्त के तहत सिर्फ दो महीनों में सीखा था। इस गायक-गीतकार-निर्माता-संगीतज्ञ के खुदके शब्दों में,’ जैसे ही मैंने गीटार बजाना शुरू किया, तभी मुझे लगने लगा कि मैं अपनी जिंदगी-गुजर के लिए बस यही करने वाला हूं।’

रघु दीक्षित लोक संगीत और रॉक के मेल के लिए जाने जाते हैं जिसे वे ‘द रघु दीक्षित प्रोजेक्ट’ कहते हैं। पिछले आठ के उनके बैड ’अर्ताग्नि’ के तहत उन्होंने 2008 में अपना पहला एल्बम ’अर्ताग्निः द फायर विदिन’। वे 250 से भी ज्यादा कॉनसर्ट कर चुके हैं। उनका संगीत लोक गीतों, ब्लूज, रॉक, सूफी, फंक, रैगे, भांगड़ा और लैटिन के अनोखा मेल हैं। मैसूर से आई, मुम्बई, अर्ताग्नि, हे भगवान, हर सांस में, गुदगुदियां, खिड़की जैसे कई गीत बहुत लोकप्रिय रहे हैं।

इस पूरी रात के जागरण में दो बजे के बाद खुद को जगा कर रखना वाकई एक चुनौती भरा काम है। कई लोग नींद की मधुर झपकियां लेने लगते हैं। एक ऐसी हालात में यह बहुत जरूरी हो जाता है कि सबको जगा कर रखा जाय। रघु दीक्षित ने सिर्फ उन्हें जगाया ही नहीं बल्कि इनके नगमों के बोल पर लोग उठ खड़े होकर साथ-साथ गाने लगे। खासकर युवाओं में एक ताजगी और स्फुर्ती आ गई।

उनका पहला गाना थाः है भगवान… उसके बाद उन्होंने पेश किया मस्ती की बस्ती में है जिंदगी। उनके हर गाने को दर्शक दीर्घा में खूब बाहबाही मिली। चिनगारी चिनगारी… खोया है राही खोया है रास्ता, रात के अंधेरे में जो मुझे उजाला दे, हे भगवान तू मुझे जिंदगी दोबारा दे, हर सांस में हर धड़कन मे हो तुम जैसे कई लोक रॉक गीत के साथ उन्होंने सबको उलझाकर रखा।

03.25

सिर्फ ईशा योग केंद्र में ही नही, महाशिवरात्रि ईशा के कई केन्द्रों में भी बहुत उत्साह से मनाई जा रही है …

02.36

सद्‌गुरु ने ध्यान सत्र का अंत इन पंक्तियों के साथ किया।

योगेश्वनराय महादेवाय नम:। त्र्यंबकाय त्रिपुरांतकाय त्रिकालाग्निकालाय

कालाग्निरुद्राय नीलकंठाय मृत्युंजयाय सर्वेश्वराय सदाशिवाय महादेवाय नमः ॥

साउंडस ऑफ ईशा मंडली ने एक अनूठी गीत ‘राही नू नकझक किया’ पेश करके सबको दंग कर दिया। हम समझ नहीं पा रहे थे कि गीत के लफ्जों में कितनी भाषाओं का मेल है।

पांजेकर की लोकगीत मंडली ने एक दक्षिण भारतीय लोक नृत्यं प्रस्तु त किया।

साउंड्स ऑफ़ ईशा की धुनों पर झूमते नाचते दर्शक

02.14

तो शिव ध्यान में मग्न थे और अचानक, उन्हें पता चला कि जो आनंद उन्हें ध्यान में मिल रहा है, रास में लीन कृष्ण और गोपीयां उसी आनंद का पान कर रहे हैं। वह देखकर हैरान थे कि छोटी उम्र का उनका वह भक्त बांस के छोटे टुकड़े की मोहक धुन पर सभी को नचाकर परम आनंद में डूबो रहा था। अब शिव से रहा नहीं गया। वह रास देखना चाहते थे। वह तुरंत उठे और सीधे यमुना तट की ओर चल दिए। नदी की देवी वृनदेवी खड़ी हो गई। देवी ने उनसे कहा, ‘आप वहां नहीं जा सकते हैं। यह कृष्ण का रास है। यहां कोई पुरुष नहीं जा सकता। अगर आपको वहां जाना है, तो आपको महिला के रूप में आना होगा।’ स्थिति वाकई विचित्र थी। आखिर शिव को पौरुष का प्रतीक माना जाता है अब ऐसे में उनके सामने बड़ी दुविधा थी कि वह महिला के वेश में कैसे आएं। वहीं, दूसरी ओर रास अपने चरम पर था।

वह वहां जाना भी चाहते थे। लेकिन नदी की देवी बीच में आ गईं और बोलीं, ‘आप वहां नहीं जा सकते। वहां जाने के लिए आपको कम से कम महिला के वस्त्र तो धारण करने ही होंगे। शिव के मांगने पर वृनदेवी ने उनके सामने गोपी वाले वस्त्र पेश कर दिए। शिव ने उन्हें पहना और नदी पार करके चले गए। यह रास में शामिल होने की उनकी बेताबी ही थी।

तो शिव को भी रास लीला में शामिल होने के लिए महिला बनना पड़ा।

एवी इलेंगो का एक चित्र
जब सद्‌गुरु शिव की गाथा का वर्णन कर रहे थे तो मशहूर पेंटर एवी इलेंगो उस धटना की खूबसूरत चित्रकारी बनाकर वहीं पर पेश कर देते हैं।
उसी धटना को अनीता रत्नम अपनी नृत्य मंडली के साथ अलग अलग मुद्राओं और नाच के माध्यम से पेश करती थी।

अनीता रत्नम अपनी नृत्य मंडली के साथ
अनीता रत्नम एक निपुण शास्त्रीय और आधुनिक नृत्यांगना और कोरियोग्रॉफर हैं जो 4 दशकों के सफल कैरियर के दौरान 15 से भी ज्यादा देशों में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुकीं हैं।
भरतनाट्यम के अलावा, वे कथाकली, मोहिनीअट्टम, ताइची और कलरीपायटू में भी प्रक्षिशित हैं। उन्होंने इन सब नृत्यकलाओं का एक अनोखा मेल पेष किया जो कला जगत में ‘नीओ भरतनाट्यम’ के नाम से जाना जाता है।

 

01.58

शिवा का अर्थ है जो नहीं है।
यह शब्द शूनय के काफी करीब है। इसके उच्चारण से उसको अनुभव किया जा सकता है जो नहीं है।
जिसे आप मैं कहते हैं वह अतीत का एक बोझ है। जब तक आप इस बोझ को गिरा नहीं देते आप कभी भी जीवन को पूर्णता में अनुभव नहीं कर सकते। शिव वह शब्द है जो आपको बोझ को गिराने में मदद करता है। शिव शब्द सृश्टि के स्रोत की चाभी है।
‘ऊं नमः शिवाय’ ’महामंत्र’ है जिसके उच्चारण से जीवन के परम आयाम को छुआ जा सकता है।

सद्‌गुरु ने इस महामंत्र के साथ मध्यरात्रि में ध्यान की एक प्रक्रिया कराई।

ईशा  के ब्रह्मचारियों के द्वारा आधी रात में आग के साथ नृत्य किया गया

01.22

शिव और योग का इतिहास

योग की बातें तो हम सब करते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि योग की अवधारणा की शुरुआत कब और कैसे हुई ?

मानवीय चेतना को आकार देने में शिव का सबसे बड़ा योगदान है। आदि योगी शिव ने इस संभावना को जन्म दिया कि मानव प्रजाति की जो सीमाएं हैं, उसके जो बंधन हैं, इंसान को उसी में संतुष्ट और निहित रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसे तरीके हैं, जिन्हें अपनाकर इंसान इन बंधनों से परे जा सकता है। भौतिकता में रहने का एक तरीका है लेकिन इसी का होकर नहीं रह जाना  है। अपने शरीर में बसने का एक तरीका है लेकिन खाली शरीर ही नहीं बन जाना है।
आदि योगी ने कहा कि अगर तुम अपने ऊपर कुछ आवश्यक काम कर लो, अपने पर थोड़ी मेहनत कर लो तो तुम्हारा अपनी वर्तमान सीमाओं से  परे जाकर विकास हो सकता है। आदि योगी का यही महात्म है।

नटराज के रूप में

हमारे यहां योगिक संस्कृति में शिव को ईश्वर के तौर पर नहीं पूजा जाता है। इस संस्कति में शिव को देवता के रूप में न मानकर आदि योगी के रूप में माना जाता है। आदि योगी मतलब प्रथम योगी यानी वह शख्स जो योग का प्रवर्तक है, उसे आरंभ करने वाला है। यह शिव ही थे जिन्होंने मानव मन में योग का बीज बोया। योग विद्या के मुताबिक 15 हजार साल से भी पहले शिव ने सिद्धि प्राप्त की और हिमालय पर एक प्रचंड और भाव विभोर कर देने वाला नत्य किया। जब तक उनके भीतर के परम आनंद ने उन्हें गति में रहने और नृत्य करते रहने का मौका दिया, तब तक वह पागलों की तरह नृत्य करते रहे, इसे नटराज के नाम से जाना जाता है।

निश्चल हो गए शिव

ऐसी स्थिति आने पर वह पूरी तरह से निश्चल हो गए। लोगों ने देखा कि वह कुछ ऐसा अनुभव कर रहे हैं, जिसके बारे में कोई कुछ नहीं जानता, कुछ ऐसा जिसकी अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। आखिरकार पूरे मामले में लोगों की दिलचस्पी बढ़ने लगी और वे इस बारे में जानने को उत्सुक हो उठे। धीरे-धीरे लोगों ने उनके पास पहुंचना शुरू कर दिया।

उनसे इस राज को पूछने आए लोगों में से ज्यादातर तो चले गए, लेकिन सात लोग ऐसे थे, जो थोड़े हठी किस्म के थे। उन्होंने ठान रखा था कि वे तभी जाएंगे, जब शिव से इस राज को जान लेंगे, लेकिन शिव ने फिर भी उन्हें नजरअंदाज कर दिया। पर ये सात लोग भी कहां पीछे हटने वाले थे।

सप्त ऋषि

खैर, आदि योगी ने स्वयं को आदि गुरु में रूपांतरित कर लिया और अपनी योगिक विद्या को इन सात जिज्ञासुओं को देना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया में कई साल लग गए और जब यह प्रक्रिया पूरी हो गई, तो इसके परिणामस्वरूप यही सात लोग पूर्ण ज्ञानी और प्रबुद्ध बन गए। इन्हें सप्त ऋषि के नाम से जाना गया।

00.56

11मार्च

‘शम्भो’ – शिव का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। इसका मतलब है ‘वह जो बहुत शुभ है’ और आपके साथ होने वाली सबसे शुभ बात आपका आत्मबोध हो सकता है। जाहिर है, इसी वहज से, मूल ऊर्जा के इस पहलू का उपयोग आध्यात्म मार्ग पर किया जाता है। ईशा में भी ‘शम्भो’ एक प्रधान पहलू रहा है। इसकी शुरूआत के वक्त से लेकर, इसके विकास और इसके चरम सीमा तक ‘शम्भो’ एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।
‘शम्भो मंत्र के उच्चारण के साथ सद्‌गुरु ने एक ध्यान प्रक्रिया में सबको दीक्षित किया।

23.49

‘अलई अलई’ तमिल सीडी रीलिज के बाद साउंडस ऑफ ईशा की संगीत मंडली ने एक यादगार प्रदर्शन किया जिसे दर्शक कभी भूल नहीं पाएंगे। ‘कनले कनले’ गीत पर पूरा पंडाल झूम उठा।

श्रोताओं के आनंद और मस्ती को देखकर सद्‌गुरु खुद को रोक नहीं पाए। नृत्य में सद्‌गुरु भी जाकर शमिल हो गए। उनके पैर ऐसे थिरक रहे थे जैसे कोई कुशल नर्तक नाच रहा हो। सद्‌गुरु को इस तरह से नृत्य करते देखकर श्रोताओं में जोश का संचार हुआ और थोड़े ही देर में पूरा पंडाल डोल उठा।

 

 

23.25

ईशा रीलिज

1    ‘काशी-द एटरनल सिटी’ – रू 99

मशहूर गीतकार और लेखक, प्रसून जोशी के साथ काशी की प्राचीन नगरी में घूमते हुए सद्‌गुरु इस महान शहर के नक्शे और ज्यामिति के पीछे के विज्ञान समझाते हैं। इस जगह से जुड़ी पौराणिक कहानियां सुनाते हुए सद्‌गुरु यह भी बताते हैं कि क्यों और कैसे  इतनी चढाइयों के बावजूद काशी ने अभी तक अपनी आध्यात्मिक संभावना को पूरी तरह से संजोकर रखा है।

2    युगाज-द टाइड्स ऑफ टाइम-रू150

महाभारत सिरीज का एक भाग ‘युगाज’, महाभारत की अनोखी कथा का बयान करता है। यह सदझ्गुरु के साथ हाल ही में हुए 8 दिन के ‘महाभारत’ कार्यक्रम की एक झलक प्रदान करता है।

 3    बिजेनस ऑफ बिजेनस – इन कॉनवर्सेशन विद द मिस्टिक – के वी कामत और सद्‌गुरु का संवाद-रू 150

‘इन कॉनवर्सेशन विद द मिस्टिक’ के तहत, इस बार सद्‌गुरु इनफोसिस के चेयरमैन और आइ‐सी‐आइ‐सी‐आइ के नॉन एग्जूटिभ चेयरमैन के‐वी कामत के बिजेनस में सफलता और नाकामयाबी, भ्रष्टाचार और लालच से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं।

श़ेखर कपूर ईशा डीवीडी रिलीज़ करते हुए

4    मूविंग इन्डिया-इन कॉनवर्सेशन विद द मिस्टिक, डा‐ जयप्रकाश नारायण और सद्‌गुरु-रू.200

इस प्रेरणादायक बातचीत में, डा‐ जयप्रकाश नारायण के साथ सद्‌गुरु नीति और सदाचार, इंसाफ, राजनीति और भ्रष्टाचार, धर्म और आध्यात्मिकता जैसे कई गंभीर विषयों पर अपने विचार हमें बताते हैं।

5    एकतारा – इन कॉनवर्सेशन विद द मिस्टिक, पंडित जसराज और सद्‌गुरु-रू 150

इस अनोखे और असामान्य डी वी डी में हिंदुस्तानी संगीत के सम्राट, पंडित जसराज, सद्‌गुरु के साथ संगीत और आध्यात्मिकता की बात करते हैं। कहते हैं कि शिव और पार्वती की शादी के वक्त, शिव के वंश के बारे में पूछे जाने पर नारद ने ‘एकतारा’ नार्तक वादन का एक मार छेड़कर इसका जवाब दिया।

6. अंग्रेजी पुस्तकें

प्रहलाद कक्कड़ बुक रिलीज़ करते हुए

बॉडी द ग्रेटेस्ट गजेट एण्ड माइंड योर विजनेस

एंबीसन टू विजन और ग्रीड इज गॉड

कॉम्पलसिवनेश टू कॉनसियसनेश और इमोशन द जूस ऑफ  लाइफ

एक ही पुस्तक में दो शिर्षक हैं। आप पुस्तक के आगे से एक शिर्षक और पीछे से दूसरी शिर्षक पढ़ सकते हैं।

 

7. सी डी

मशहूर डिज़ाइनर सत्य पॉल

अलई-आनंद की एक लहर-रू 80

तमिल के गीतों का संग्रह, ‘अलई’ साउंडस ऑफ ईशा के द्वारा बनाया गया है जिसमें सद्‌गुरु के महासत्संगों में गाए और बजाए जाने वाले गीत हैं।

 

आखिरी में रीलिज हुई मराठी की पुस्तकें

मराठी और तेलगू पुस्तकों का विमोचन

प्रकाश रेड्डी

मराठी पुस्तक – वाटे वरची फुले-अंग्रेजी पुस्तक फलॉवर्स ऑन द पाथ का अनुवाद

तेलगू पुस्तक- फूल वरचिन वाटा – अंग्रेजी पुस्तक फलॉवर्स ऑन द पाथ का अनुवाद

तेलगू पुस्तक – भाले रुचि– सेहत और स्वाद से भरे विभिन्न तरह के व्यंजन।

 

22.06

अरूना साइराम

सद्‌गुरु के ओजपूर्ण संबोधन के बाद मंच पर विराजमान हुई कर्णाटक संगीत की मशहूर गायिका अरूना सायराम। उनको कर्णाटक गायन की शिक्षा उनकी मां सुश्री राजलक्ष्मी सेतुरमन से मिली। अपनी गायकी के दौरान उन्होंने कई विख्यात अतर्राष्ट्रिय कलाकारों जैसे डोमीनीक वेलॉर्ड के साथ भी काम किया है। इसके अलावा उन्होंने भारत और उसके बाहर अनेकों जानी मानी संगीत सभाओं और संगीत उत्सवों जैसे न्यू यार्क के ‘कार्नेजी हॉल’, पैरिस के ‘ले थियेटर ड ल विल’ और मोरोको के ’फेस्टिवल ऑफ वर्ल्ड सेक्रेड म्यूजिक’ में भी भाग लिया है।

हिंदी गीत, ‘गुरु जी, गंगा न जाउं यमुना न जाउं’ संगीत की दृष्टि से वाकई काबिले तारीफ रहा। इसके अलावा इन्होंने कई तमिल और बंगाली गीत भी गाये। मां दुर्गा की स्तुति में गायी गई बंगाली गीत ‘जागो तुम्हो जागों’ की अनूठी पारलौकिक धुन ने सबको झूमने के लिये विवश कर दिया।

सद्‌गुरु ने मंच पर आकर सभी मौजूद श्रोताओं को महाशिवरात्रि महोत्सव में स्वागत किया और टेलीविजन पर घर बैठे देख रहे दर्शकों को इसमें पूरे दिल से शामिल होने के लिये आमंत्रित किया।

उन्होंने कहा कि “कृष्णपक्ष में हरेक  चन्द्रमास का चौदहवां दिन या अमावस्या से पहले वाला दिन शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक पंचांग वर्ष की सभी बारह शिवरात्रियों में से, महाशिवरात्रि, सबसे अधिक महत्वपूर्ण  मानी जाती है। इस रात पृथ्वी के  ऊपरी गोलार्ध की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में सहज रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है। यह एक ऐसा दिन होता है जब प्रकृति इंसान को उसके आध्यात्मिक शिखर की ओर ढकेल रही होती है। इस घटना का उपयोग करने के लिए हमारी परंपरा में यह खास त्योहार बनाया गया है, जो पूरी रात मनाया जाता है। इसे पूरी रात मनाने का मूल मकसद यह तय करना है कि ऊर्जा का यह प्राकृतिक चढ़ाव या उमाड़ अपना रास्ता पा सके। महाशिवरात्रि की पूरी रात आपको अपना मेरूदण्ड सीधा रखना चाहिए और जगे रहना चाहिए।…’

महाशिवरात्रि का महत्‍व जानने के लिए पढ़ें प्रगति की भव्य संभावना है महाशिवरात्रि

निर्वाण षट्कम के बाद ईशा संस्कृति के बच्चों ने एक तमिल गीत ‘सद्‌गुरु वीन’ से दर्शको को मुग्ध कर दिया। इस भक्ति गीत में सबके दिल को छू लेने का भाव है।

 

20.43

100,000 वर्ग मीटर में फैला आयोजन स्थल के ठीक बीच में दमक रहा है एक भव्य पंडाल। इस विशाल पंडाल में लगभग 10,0000 लोग एक साथ बैठ सकते हैं।

लोग धीरे धीरे आयोजन स्थल पर पहुंच रहे हैं और अपने अपने स्थान पर विराज रहे हैं। सद्‌गुरु भी आ पहुंचे हैं, वे अपना स्थान ग्रहण कर रहे हैं। कार्यक्रम की शुरूआत हुई है शंकराचार्य रचित निवार्ण षट्कम से।

ईशा के ब्रह्मचारी गुंजित ध्वनि में निर्वाण षट्कम गा रहे हैं। इस देव गीत को सुनकर मन सहज ही रागों से मुक्त होने लगता है। यह अनोखा षट्कम, वाकई वैराज्ञ के सार को दर्शाता है।

 

पढ़े : निर्वाण षट्कम

मनो बुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे

न च व्योम भूमिर् न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् 1

मैं न तो मन हूं, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं

मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं

मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं

मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर् न वा पञ्चकोश:

न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् 2

मैं न प्राण हूं,  न ही (शरीर को चलाने वाली) पंच वायु हूं

मैं न (शरीर का निर्माण करने वाली) सात धातुएं हूं,

और न ही (शरीर के) पांच कोश हूं

मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही वियर्जन की इन्द्रियां हूं

मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:

न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूपरू शिवोऽहम् शिवोऽहम् 3

न मुझे घृणा है, न लगाव है, न मुझे लोभ है, और न मोह

न मुझे अभिमान है, न ईर्ष्या

मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं

मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुरूखम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदार: न यज्ञा:

अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम् 4

मैं पुण्य, पाप, सुख और दुख से विलग हूं

मैं न मंत्र हूं, न तीर्थ, न ज्ञान, न ही यज्ञ

न मैं भोजन(भोगने की वस्‍तु) हूं, न ही भोग का अनुभव, और न ही भोक्ता हूं

मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

 न मृत्युर् न शंका न मे जातिभेद:पिता नैव मे नैव माता न जन्म

न बन्धुर् न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् 5

न मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भेदभाव

मेरा न कोई पिता है, न माता, न ही मैं कभी जन्मा था

मेरा न कोई भाई है, न मित्र, न गुरू, न शिष्य,

मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि, अनंत शिव हूं।

 अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्

न चासंगतं नैव मुक्तिर् न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम् 6

मैं निर्विकल्प हूं, निराकार हूं

मैं चैतन्‍य के रूप में सब जगह व्‍याप्‍त हूं, सभी इंद्रयिों में हूं,

न मुझे किसी चीज में आसक्ति है, न ही मैं उससे मुक्त हूं,

मैं तो शुद्ध चेतना हूं, अनादि‍, अनंत शिव हूं।

6.40pm

पंच भूत आराधना में लगभग 200 लोगों ने हिस्सा लिया। आईए सुनते हैं एक भाई का अनुभव।

“ ध्यानलिंग में आज सबकुछ अलौकिक सा था। मैं यह समझ नहीं पा रहा था कि मेरे साथ हो क्या रहा है। अचानक ही मेरी रीढ़ हिलने लगी और एक अजीबोगरीब आनंद में ढूब गया। आंख खोलना मुमकिन नहीं था क्योंकि मेरे अंदर में बहुत कुछ हो रहा था और मैं एक पल के लिये भी उसे खोना नहीं चाहता था। अंदर में इतना सुखद अहसास पहली बार हुआ है। मैंने एक नई ताजगी और जीवन को चखा है।”

पंचभूत आराधना की समाप्ति के बाद अब सद्‌गुरु आयोजन स्थल की ओर चले। ध्यानलिंग से आयोजन स्थल की दूरी एक किलोमीटर से थोड़ा अधिक है। लोगों का हूजूम उमड़ पड़ा है, कई लोग वाहनों से बढ़ रहे हैं, तो कई चहलकदमी करते आहिस्ते आहिस्ते आसपास की प्राकृतिक छटा का आनंद लेते हुए आयोजन स्थल की ओर बढ़ रहे हैं। वेलियंगिरि पर्वत की इन अंधेरी सूनसान राहों में आज बड़ी चकाचौंध है। जगह जगह पर ट्यूबलाईट लगी हुई हैं, सड़कों पर चलते हुए आप हजारों लोगों से होकर गुजरते हैं। रास्ते पर मेला लगा हुआ है।

 

 

19.37

5.40 – 6.10 pm

हर शिवरात्रि को ध्यानलिंग में शाम 5‐ 40 से 6‐10 के बीच पंच भूत आराधना का आयोजन होता है। आज की आराधना सद्‌गुरु की मौजूदगी में कुछ विशेष हो्गी । यह एक ऐसी अनोखी आराधना है, जो पंच तत्वों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बने इंसानी शरीर को शुद्ध करती है। इससे सुख और सेहत का लाभ होता है। अधिक जानकारी के लिये पढ़ेः ध्यानलिंग में पंचभूत आराधना

5.40pm

शून्या कुटिर के सामने खड़े हजारों साधकों में अचानक उत्साह की एक लहर दौर गयी है। ये लोग घंटों से टकटकी लगाए कुटिर के द्वार को निहार रहे थे जहां से अब सद्‌गुरु बाहर निकल रहे हैं। खुले बदन, कमर में धोती, सिर पर पगड़ी और चमकते ललाट पर भौहों के बीच विभूति लगाए वो अतीत के कोई सिद्ध योगी लगते हैं। पगडंडी के दानों तरफ श्रद्धालुओं की लंबी कतार है जो उनके दर्शन को आतुर हैं। उनके आजू बाजू में केश मुंडित ब्रह्ममचारी और सन्यासी जा रहे हैं जो हाथों में  एक विशाल छत्र धारण किये हैं। छत्र के नीचे हाथ जोड़े, श्रद्धालुओं की ओर करुनामयी आखों से निहारते सद्‌गुरु धीमे धीमे कदमों से ध्यानलिंग के अंदर प्रवेश कर गये। अब ध्यानलिंग में होगी पंचभूत आराधना।

5.30 pm

ध्यानलिंग योग परिसर में आज बखूबी चहल पहल है। ध्यानलिंग और लिंग भैरवी मंदिर की सजावट वाकई शानदार है। दूर दराज से आये अतिथियों का मार्गदर्शन करने के लिए जगह जगह पर स्वयंसेवी नमस्कार की मुद्रा में खड़े हैं।

विदेशों से आए मेहमान अंग्रेजी में बोलचाल कर रहें हैं, वहीं दिल्ली, जयपुर, भोपाल वगैरह से आये भाई लोग हिंदी में पूछताछ कर रहें हैं। तमिल भाषी अन्ना से हिंदी में जवाब नहीं मिलने पर भाई लोगों के चेहरे की भाव भंगिमा से ऐसा लगता है, जैसे वे पूछ रहें हो, “आपको हिंदी नहीं आती क्या?” साथ ही साथ तेलगू, मराठी, कन्नड़ भाषी लोग भी हर जगह मिल जाते हैं।

कुल मिलाकर ईशा योग केंद्र अभी सांस्कृतिक संगम का केंद्र बना हुआ है, जहां पर सभी धर्मों के लोग अपनी सरहदों को पार करके बस एक जीवंत सद्‌गुरु का सानिध्य पाना चाहते हैं। सद्‌गुरु कृपा की बहती गंगा में आपनी जन्मजन्मांतर के कर्मों की गंदगी को धोकर निर्मल हो जाना चाहते हैं।

 

 

13.50

महाशिवरात्रि महोत्सव 2013 के शुरू होने में अभी 4 घंटे बाकी हैं । आईये तब तक हम पिछले साल की महाशिवरात्रि की झाकियों का आनंद लेते हैं …

 

 


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2 Comments

  • Swami Rijuda says:

    मैं मुझे मृत्यु का डर है, न जाति का भय

    निर्वाण षटकम के पांचवे श्लोक के अनुवाद मे गलती है. कृपया सुधारें.

    • IshaBlogHindi says:

      कृपया माफ करेंगे, सीधा प्रसारण की अपनी सीमाएं हैं। बावजूद इसके हमारी
      भरपूर कोशिश रहेगी कि हम इस तरह की तृटियों से बचें। सुझाव के लिए
      धन्‍यवाद।

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