भगवान शिव के अनेक रूप, अनेक नाम

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Sadhguru भारतीय परंपरा में, शिव के कई रूप हैं। लेकिन क्यों? और क्या हर रूप का अपना एक अलग मतलब है?

 

 

भोलेनाथ

शिव को हमेशा से एक बहुत शक्तिशाली प्राणी के रूप में देखा जाता रहा है। साथ ही, यह समझा जाता है कि वह सांसारिक रूप से बहुत चतुर नहीं हैं। इसलिए, शिव के एक रूप को भोलेनाथ कहा जाता है, क्योंकि वह किसी बच्चे की तरह हैं। ‘भोलेनाथ’ का मतलब है, मासूम या अज्ञानी। आप पाएंगे कि सबसे बुद्धिमान लोग भी बहुत आसानी से मूर्ख बन जाते हैं, क्योंकि वे छोटी-मोटी चीजों में अपनी बुद्धि नहीं लगा सकते। बहुत कम बुद्धिमत्ता वाले चालाक और धूर्त लोग दुनिया में आसानी से किसी बुद्धिमान व्यक्ति को पछाड़ सकते हैं। यह धन-दौलत के अर्थ में या सामाजिक तौर पर मायने रख सकता है, मगर जीवन के संबंध में इस तरह की जीत का कोई महत्व नहीं है।

बुद्धिमान से हमारा मतलब स्मार्ट होने से नहीं है। इसका मतलब उस आयाम को स्वीकार करने से है, जो जीवन को पूर्ण रूप से घटित होने देता है, विकसित होने देता है। शिव भी ऐसे ही हैं। ऐसा नहीं है कि वह मूर्ख हैं, मगर वह हर छोटी-मोटी चीज में बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करते।

नटराज

नृत्य के देवता नाटेश या नटराज, शिव के सबसे महत्वपूर्ण रूपों में से एक है। जब मैं स्विटजरलैंड के में स्थित नाभिकीय प्रयोगशाला (CERN) गया था – यह धरती पर भौतिकी की सबसे बड़ी प्रयोगशाला है जहां अणुओं की सारी तोड़-फोड़ होती है – तो मैंने देखा कि वहां प्रवेशद्वार के सामने नटराज की एक मूर्ति है। क्योंकि उन्हें महसूस हुआ कि मानव संस्कृति में इसके सिवाए ऐसा कुछ नहीं है, जो उनके अभी के काम से मिलता-जुलता हो, उसके करीब हो।

नटराज रूप सृष्टि के उल्लास और नृत्य यानी कंपन को दर्शाता है, जिसने शाश्वत स्थिरता और नि:शब्दता से खुद को उत्पन्न किया है। चिदंबरम मंदिर में स्थापित नटराज की मूर्ति बहुत प्रतीकात्मक है। क्योंकि जिसे आप चिदंबरम कहते हैं, वह पूर्ण स्थिरता है। इस मंदिर के रूप में यही  बात प्रतिष्ठित की गई है कि सारी गति पूर्ण स्थिरता से ही पैदा हुई है। शास्त्रीय कलाएं इंसान के अंदर यही पूर्ण स्थिरता लाती हैं। स्थिरता के बिना सच्ची कला नहीं आ सकती।

अर्धनारीश्वर

आम तौर पर, शिव को परम या पूर्ण पुरुष माना जाता है। मगर अर्धनारीश्वर रूप में, उनका आधा हिस्सा एक पूर्ण विकसित स्त्री का होता है। कहा जाता है कि अगर आपके अंदर की पौरुष यानी पुरुष-गुण और स्त्रैण यानी स्त्री-गुण मिल जाएं, तो आप परमानंद की स्थायी अवस्था में रहते हैं। अगर आप बाहरी तौर पर इसे करने की कोशिश करते हैं, तो वह टिकाऊ नहीं होता और उसके साथ आने वाली मुसीबतें कभी खत्म नहीं होतीं। पौरुष और स्त्रैण का मतलब पुरुष और स्त्री नहीं है। ये खास गुण या विशेषताएं हैं। मुख्य रूप से यह दो लोगों के मिलन की चाह नहीं है, यह जीवन के दो पहलुओं के मिलन की चाह है, जो बाहरी और भीतरी तौर पर एक होना चाहते हैं। अगर आप भीतरी तौर पर इसे हासिल कर लें, तो बाहरी तौर पर यह सौ फीसदी अपने आप हो जाएगा। वरना, बाहरी तौर पर यह एक भयानक विवशता बन जाएगा।

यह रूप इस बात को दर्शाता है कि अगर आप चरम रूप में विकसित होते हैं, तो आप आधे पुरुष और आधी स्त्री होंगे। इसका मतलब यह नहीं कि आप नपुंसक होंगे, बल्कि एक पूर्ण विकसित पुरुष और एक पूर्ण विकसित स्त्री होंगे। तभी आप एक पूर्ण विकसित इंसान बन पाते हैं।

कालभैरव

कालभैरव शिव का एक मारक या जानलेवा रूप है – जब उन्होंने समय के विनाश की मुद्रा अपना ली थी। सभी भौतिक हकीकतें समय के भीतर मौजूद होती हैं। अगर मैं आपके समय को नष्ट कर दूं, तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा।

शिव भैरवी-यातना को पैदा करने के लिए उपयुक्त वस्त्र धारण करके कालभैरव बन गए। ‘यातना’ का मतलब है, घोर पीड़ा। जब मृत्यु का पल आता है, तो बहुत से जीवनकाल पूरी तीव्रता में सामने आ जाते हैं, आपके साथ जो भी पीड़ा और कष्ट होना है, वह एक माइक्रोसेकेंड में ‍घटित हो जाएगा। उसके बाद, अतीत का कुछ भी आपके अंदर नहीं रह जाएगा। अपने ‘सॉफ्टवेयर’ को नष्ट करना कष्टदायक है। मगर मृत्यु के समय ऐसा होता है, इसलिए आपके पास कोई चारा नहीं होता। लेकिन वह इसे जितना हो सके, छोटा बना देते हैं। कष्ट को जल्दी से खत्म होना होता है। ऐसा तभी होगा, जब हम इसे अत्यंत तीव्र बना देंगे। अगर वह हल्का होगा, तो हमेशा चलता ही रहेगा।

जब मृत्यु का पल आता है, तो बहुत से जीवनकाल पूरी तीव्रता में सामने आ जाते हैं, आपके साथ जो भी पीड़ा और कष्ट होना है, वह एक माइक्रोसेकेंड में ‍घटित हो जाएगा। उसके बाद, अतीत का कुछ भी आपके अंदर नहीं रह जाएगा। अपने ‘सॉफ्टवेयर’ को नष्ट करना कष्टदायक है।

आदियोगी

योगिक परंपरा में शिव की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं की जाती है। वह आदियोगी, यानि पहले योगी और आदिगुरु, यानि पहले गुरु हैं, जिनसे योगिक विज्ञान जन्मा। दक्षिणायन की पहली पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा होती है, जब आदियोगी ने इस विज्ञान को अपने पहले सात शिष्यों, सप्तऋषियों को सौंपना शुरू किया।

यह किसी भी धर्म से पहले की बात है। इंसान ने मानवता को तोड़ने-फोड़ने के विभाजनकारी तरीके ढूंढे, उससे पहले मानव चेतना को बढ़ाने के लिए जरूरी और सबसे शक्तिशाली साधनों को पहचाना और प्रचारित किया गया। उसकी गूढ़ता आश्चर्यजनक है। उस समय लोग इतने प्रबुद्ध थे या नहीं, इस सवाल का कोई मतलब नहीं है क्योंकि यह किसी खास सभ्यता या विचार प्रक्रिया से नहीं जन्मा था। यह एक आंतरिक ज्ञान से उपजा था। उन्होंने बस अपने आप को उड़ेल दिया। आप आज भी एक चीज तक नहीं बदल सकते क्योंकि जो कुछ भी कहा जा सकता है, उन्होंने वह सब बहुत ही सुंदर और समझदारी भरे रूपों में कहा। आप बस उसे समझने की कोशिश में अपना पूरा जीवन बिता सकते हैं।

त्रयंबक

शिव को हमेशा त्रयंबक कहा गया है क्योंकि उनकी एक तीसरी आंख है। तीसरी आंख का मतलब यह नहीं है कि माथे में कोई दरार है। इसका मतलब बस यह है कि उनका बोध या अनुभव अपनी चरम संभावना पर पहुंच गया है। तीसरी आंख अंतर्दृष्टि की आंख है। दोनों भौतिक आंखें सिर्फ आपकी इंद्रियां हैं। वे आपके मन को हर तरह की फालतू बातों से भरती हैं क्योंक आप जो देखते हैं, वह सत्य नहीं है। आप किसी इंसान को देखकर उसके बारे में कुछ अंदाजा लगाते हैं, मगर आप उसके अंदर शिव को नहीं देख पाते। इसलिए एक और आंख को खोलना जरूरी है, जो और गहराई में देख सके।

कितना भी सोचने से या दार्शनिक चिंतन से कभी आपके मन को स्पष्टता नहीं मिल पाएगी। कोई भी आपकी तार्किक स्पष्टता को बिगाड़ सकता है, मुश्किल हालात उसे पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर सकते हैं। जब आपकी भीतरी दृष्टि खुल जाती है, जब आपके पास एक आंतरिक दृष्टि होती है, तभी आपको पूर्ण स्पष्टता मिलती है।

जिसे हम शिव कहते हैं, वह और कुछ नहीं, बस चरम बोध का साकार रूप है। ईशा योग केंद्र में इसी संदर्भ में महाशिवरात्रि मनाई जाती है। यह हर किसी के लिए अपने बोध को कम से कम एक स्तर बढ़ाने का एक मौका और संभावना है। शिव और योग का मतलब यही है। यह धर्म नहीं है, यह आंतरिक विकास का विज्ञान है।

महाशिवरात्रि की यह रात आपके लिए सिर्फ जागरण की रात बन कर न रह जाए, बल्कि इसे अपने लिए तीव्र जीवंतता और जागरूकता की रात बना दें। मेरी कामना और आशीर्वाद है कि आप इस अद्भुत उपहार का लाभ उठाएं, जो प्रकृति इस दिन हमें प्रदान करती है। मैं आशा करता हूं कि आप सभी इस लहर पर सवार हों और ‘शिव’ की सुंदरता और आनंद को जान पाएं।

महाशिवरात्रि उत्सव का पूरा मज़ा उठायें, और भाग लें और एक कदम उठायें अपने आध्यात्मिक विकास की ओर, सदगुरु और शिव के साथ…

महाशिवरात्रि – एक रात शिव के साथ


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