मानसरोवर : रहस्यों से लबालब एक झील

मानसरोवर: रहस्यों से लबालब एक झील

Sadhguruमानसरोवर झील में ऐसा क्या है, जो इसे विश्व की अन्य झीलों से अलग बना देता है? ईशा योग केंद्र द्वारा आयोजित की जाने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा जिज्ञासुओं को इस झील से जुड़े तमाम अलौकिक अनुभवों से रूबरू कराती है। इस यात्रा दौरान अपने मानसरोवर झील के अनुभवों को आपके साथ बांट रहे हैं स्वयं सद्‌गुरु 

यक्षों और गणों की कहानियों सी है ये झील

बचपन से ही मैंने यक्ष, गण और देवताओं के बारे में हर तरह की कहानियां सुनी हैं। मुझे उन्हें सुनने में भरपूर आनंद तो आता था, लेकिन उन पर भरोसा नहीं होता था। लेकिन जब मैं पहली बार मानसरोवर गया, तो वहां मैंने तमाम ऐसी चीजों को होते देखा, जिन्हें मैं असंभव मानता था।

ऋग्वैदिक काल से ही हम तारों पर सवारी करने वालों, या तारों से पृथ्वी पर आने वाले लोगों के बारे में सुनते आए हैं। ऐसे लोग जो आकाश में रहते हैं, और आम लोगों के जीवन में अपना योगदान देते हैं।
धीरे-धीरे अब मैं सोचने लगा हूं, कि कहीं वे कहानियां भी सच्ची तो नहीं हैं, जिन्हें मैं बचपन से सुनता आ रहा हूं। हालांकि ये सब सोचते वक्त मुझे अपनी बेवकूफी का अहसास होने लगता है, क्योंकि दुनिया भर में मेरी पहचान एक स्पष्टवादी गुरु की है। मेरे तर्क ऐसे होते हैं, जिनमें कोई नुक्स नहीं निकाल पाता। ऐसे में अगर अब मैं उस सबके बारे में बात करूं, जो मैं देख रहा हूं  – खासकर मानसरोवर में, तो इसका मतलब है कि मैं अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा रहा हूं।

भारतीय धर्म ग्रंथों में मिलने वाली दूसरे लोक के प्राणियों की कहानियाँ

भारत के धर्म ग्रंथों में बहुत से प्रसंग हैं, जिनमें दूसरे लोक के प्राणियों द्वारा यहां घूमने, यहां के आम लोगों से बातचीत करने और तमाम दूसरी बातों की चर्चा है। मैंने हमेशा उन सभी बातों और प्रसंगों को बढ़ा चढ़ाकर की गई बातें कहकर अस्वीकार किया है। लेकिन जब आप दुनिया की संस्कृतियों पर गौर करते हैं, तो इसी तरह की तमाम कहानियां देखने और सुनने को मिलती हैं। अगर वास्तव में ऐसा कुछ न हुआ होता, तो हर जगह लगभग एक जैसी कहानियां न बनी होतीं।

उनके बारे में कुछ भी विस्तार से कहना मुश्किल है। इसके लिए हमारे पास शब्द ही नहीं हैं, क्योंकि यह जीवन के तमाम मूलभूत मानदंडों को चुनौती देते हैं।
बाइबल में खासकर यूनानी संस्कृति में भी ऐसी ही कहानियों का जिक्र मिलता है। यहां तक कि नाम भी एक जैसे लगते है। ऋग्वैदिक काल से ही हम तारों पर सवारी करने वालों, या तारों से पृथ्वी पर आने वाले लोगों के बारे में सुनते आए हैं। ऐसे लोग जो आकाश में रहते हैं, और आम लोगों के जीवन में अपना योगदान देते हैं। इन प्रसंगों में बताया जाता है कि वे लोग इस धरती पर कैसे आए। ठीक ऐसी ही बातें और कहानियां हमें सुमेरियन संस्कृति, मेसोपोटामिया की संस्कृति, अरब की कुछ खास संस्कृतियों, अफ्रीका के उत्तरी भागों में और दक्षिण अमेरिका में भी सुनने व पढ़ने को मिलती हैं। हजारों सालों तक इन महाद्वीपों के बीच कोई संपर्क ही नहीं रहा है। इसके बावजूद इन सभी जगहों पर एक से शब्दों में रची एकसी कहानियां सुनने को मिलती हैं।

मानसरोवर झील का इतिहास

मानसरोवर टेथिस सागर का अवशेष है। जो कभी एक महासागर हुआ करता था, वह आज 14900 फुट ऊंचे स्थान पर स्थित है। इन हजारों सालों के दौरान इसका पानी मीठा हो गया है, लेकिन जो कुछ चीजें यहां पाई जाती हैं, उनसे जाहिर है कि अब भी इसमें महासागर वाले गुण हैं। सबसे बड़ी बात यह है, कि यहां जीवन के एक अलग रूप से जुड़ी तमाम गतिविधियां हैं। जैसा कि मैंने बार-बार कहा है, मैं आध्यात्मिक रूप से शिक्षित नहीं हूँ, न ही मुझे किसी धर्मग्रंथ या उपदेश की कोई जानकारी है। मैं जो भी जानता हूं, वह बस यह जीवन ही है। इसकी शुरुआत से इसके अंत तक मैं इसे अच्छी तरह जनता हूं।

मानसरोवर में ऐसी बहुत सी बातें होती रहती हैं। खासकर सुबह के  2:30 से 3:45 बजे के बीच तो यहां जोर शोर से क्रियाकलाप होते हैं। घड़ी में देखकर यह सब उसी वक्त आरंभ होता है और ठीक 3:45 बजे समाप्त हो जाता है।
इस जीवन को जानकर इसी के आधार पर आप जीवन के अन्य रूपों को जान सकते हैं। तो हमने जो कुछ भी मानसरोवर में देखा, वह जीवन है, लेकिन यह वैसा जीवन नहीं है, जिसके बारे में हम जानते हैं। जीवन के जो मूल मानदंड यहां हैं, वे या तो व्यक्तिगत हैं, या फिर जब वे एक साथ मिलते हैं तो वे अपनी पहचान खो देते हैं। हमारी आध्यात्मिक प्रक्रिया का आधार भी यही है। मनुष्य जीवन या तो चैतन्य है या चैतन्य नहीं है। लेकिन मानसरोवर में मैंने जो कुछ भी देखा, वह इन मानदंडों को चुनौती देता है। वहां सब कुछ व्यक्तिगत है, फिर भी आपस में गुथा हुआ है। वहां सब कुछ अचेतन सा लगता है और ऐसा लगता है जैसे सब कुछ अपनी प्रकृति के अनुसार चल रहा है, लेकिन वह बहुत चेतन भी है। बहुत ज्यादा चेतन, ज्यादातर इंसानों से भी ज्यादा। मज़े की बात यह है कि वे खुद बस यूं ही चलने लगते हैं, स्वचालित रहते हैं। उनके बारे में कुछ भी विस्तार से कहना मुश्किल है। इसके लिए हमारे पास शब्द ही नहीं हैं, क्योंकि यह जीवन के तमाम मूलभूत मानदंडों को चुनौती देते हैं।

ब्रह्म मुहूर्त से मेल खातीं हैं ये गतिविधियाँ

मानसरोवर में ऐसी बहुत सी बातें होती रहती हैं। खासकर सुबह के  2:30 से 3:45 बजे के बीच तो यहां जोर शोर से क्रियाकलाप होते हैं। घड़ी में देखकर यह सब उसी वक्त आरंभ होता है और ठीक 3:45 बजे समाप्त हो जाता है। योगिक सिस्टम में हमें हमेशा यही बताया गया है, कि सुबह 3:40 बजे से 3:45 के बीच ब्रह्म मुहूर्त होता है। यही वह वक्त है जब हमें सोकर उठ जाना चाहिए। ठीक 3:45 पर वहां होने वाले क्रियाकलाप अपने आप समाप्त हो जाते हैं, मानो किसी ने अलार्म लगाकर रखा हो।

विश्व में हजारों सालों से एक जीवंत प्रक्रिया रही है – कुछ लोगों के समूहों और कुछ खास अध्यात्मिक समाजों के लोग हिमालय और तिब्बत की यात्रा करते आ रहे हैं। ऐसी यात्रा वे कुछ खास जीवों से मिलने के लिए करते हैं। यह एक मान्यता या फिर कोई रिवाज भी हो सकता है। ये खास जीव हमेशा इन जगहों पर मिलते हैं, और वहां आने वाले लोगों का मार्ग-दर्शन करते हैं। भारतीय योगियों ने हमेशा ऐसा किया है। बौद्ध लोग भी हिमालय के कुछ हिस्सों में जाते हैं, जहां वे भूतकाल के अपने गुरुओं से मिलते हैं। मध्य एशियाई देशों के और भी कई गूढ़ और गुप्त समूहों ने भी यह काम लंबे समय तक किया है। मध्य पूर्व के ड्रूज़ जिनका हमेशा ऐसा मानना रहा है, कि उनके गुरु हिमालय से ही आए थे, उन्होंने भी हिमालय की ऐसी यात्राओं को जारी रखा। इसके अलावा, तमाम दूसरे समूहों ने भी हिमालय की यात्रा की है। यह जगह कई मामलों में आध्यात्मिक प्रक्रिया का प्रमुख केंद्र है। रहस्यवाद के विज्ञान की शुरुआत यहीं से हुई है।

हम भगवान शिव को भी यक्ष स्वरूपी मानते हैं

भारत एक ऐसा देश है, जहां हमेशा से भगवान शिव को सबसे महत्वपूर्ण भगवान माना जाता है। भगवान शिव के बारे में यहां हजारों कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन उनके बचपन के बारे में एक भी कहानी सुनने को नहीं मिलती। हमारी संस्कृति में यह एक स्थापित तथ्य है कि – भगवान शिव स्वयंभू थे -उनका जन्म किसी के यहां नहीं हुआ। उनकी उत्पत्ति कहीं और से मानी जाती है। हम जानते हैं कि उनके मित्र गणों को हमेशा पिशाच और भूत प्रेत माना गया, जो पागल हैं और विक्षिप्त से हैं। इंसानों ने उनकी पूजा की, लेकिन उनके सबसे नजदीकी लोग इंसान नहीं थे। उनके बुढ़ापे और मृत्यु के बारे में भी कुछ सुनने को नहीं मिलता।

 शिव सूत्र में उन्हें यक्ष स्वरूपी कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह पृथ्वी के नहीं हैं। मैंने कभी नहीं माना कि ये सभी बातें सत्य हो सकती हैं। लेकिन मानसरोवर की चीजों का अनुभव करने के बाद वे सब बातें इतनी सच लगती हैं, कि मुझे अंदर से कंपकपी हो रही है! 
यह माना जाता है कि कोई भी महिला उनके लिए बच्चा नहीं जन सकी। शिव की सती और पार्वती से कोई संतान नहीं थी। उनकी दोनों संतानों का जन्म तांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से हुआ। हमारी संस्कृति के अनुसार गणेश की उत्पत्ति पार्वती ने चंदन के मिश्रण से की थी। शिव के दूसरे पुत्र – जिन्हें सुब्रमण्यम या मुरुगन या स्कंद नामों से पुकारा जाता है – का जन्म छह अप्सराओं के छह अलग अलग गर्भों से हुआ था, और फिर वे छह अलग-अलग शरीर एक में ही मिल गए थे। दरअसल, शिव के बारे में जो कुछ भी पढ़ने-सुनने को मिलता है, उससे यही लगता है, कि वह इस पृथ्वी के नहीं हैं। शिव सूत्र में उन्हें यक्ष स्वरूपी कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह पृथ्वी के नहीं हैं। मैंने कभी नहीं माना कि ये सभी बातें सत्य हो सकती हैं। लेकिन मानसरोवर की चीजों का अनुभव करने के बाद वे सब बातें इतनी सच लगती हैं, कि मुझे अंदर से कंपकपी हो रही है!

मानसरोवर झील व्याख्या से परे है

वहां कुछ ऐसा हो रहा है, जिसकी व्याख्या नहीं की जा सकती, और जो पूरी तरह अविश्वसनीय है। झील के नीचे कुछ ऐसा हो रहा है, जो हमारी कल्पना के भी परे है। इस पूरी प्रक्रिया के रहस्य को अभी समझा जाना बाकी है। वहां एक बड़ी सी कंदरा है, जहां कई तरह की जीवन प्रक्रियाएं हो रही हैं। इनमें से कुछ ऐसी हैं, जिन्हें हम जानते हैं, कुछ ऐसी हैं जिन्हें हम नहीं जानते। जो कुछ भी वहां हो रहा है, उसे करने के लिए जो मूल सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है, उसका रंग चमकदार नीला है और इसे एक पवित्र स्थान की तरह रखा गया है। अपनी संस्कृति में हर महत्वपूर्ण देवता को नीले रंग का माना जाता है। जो कोई भी योगिक मार्ग पर चलता है, और जिस किसी ने भी साधना की है, अपने आप ही उसका प्रभामंडल नीला हो जाता है। मानसरोवर में मैंने जो कुछ भी देखा, उसे स्पष्ट तौर पर बता पाना बेहद मुश्किल है, क्योंकि तर्क पूर्ण तरीके से इसकी व्याख्या असंभव है। यह जीवन ही है; लेकिन जीवन के जिस रूप से हम परिचित हैं, यह उससे बिलकुल अलग है।


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  • Neo

    Do you mean that our Gods were aliens? There had been a lot of research going on and there is a society of believers, a lot of scientific fraternity is also working on this.
    If our Gods were actually aliens then who is God and where is he? Even if Lord Vishnu was much more powerful as compared to us, on his own planet he wasn’t unique and there would be many like him.. I don’t understand that then why we should worship aliens?

    • महादेव जाधोर

      Neo whoever you are. You are wrong at first side where you defined God as a powerful being, here is big mistake. God cannot be define nor this way or not that way. Only possibility is inner experience not as a powerful identity but as a wholeness, transparent that even mind is dissolved & what remains is existential truth, awareness for that you needs to go throgh Devotion, Sadhanaa, Meditation, Surrender to ultimate & very important thing is that your urge, curiosity towards who am i, what is existance.

      Now one more thing God is not who comes from sky, other planet & we don’t need to surrender or slavery. If there is living beings in other worlds, planets for them we are aliens, isn’t it?

      Inner flowering that is godliness

      • Neo

        Thanks Mahadev!!

        Agreed, the only point was that why worship Aliens if Vishnu, Indra and even Shiv were from another planet